मणिपुर में सुरक्षा बलों द्वारा हाल ही में की गई संयुक्त कार्रवाई में उग्रवादी संगठन यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ-पी) के ठिकाने से भारी मात्रा में आधुनिक हथियार और ड्रोन जैमर बरामद किए गए हैं। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, यह पहली बार है जब किसी भारतीय उग्रवादी संगठन के पास इतनी उन्नत इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (EW) क्षमता देखी गई है।
20 मई को आसाम राइफल्स, CRPF और मणिपुर पुलिस द्वारा इंफाल पश्चिम के लामदेंग क्षेत्र में संयुक्त अभियान चलाया गया। इस दौरान 60 से अधिक हथियारों और बड़ी मात्रा में सैन्य सामग्री को जब्त किया गया। बरामद हथियारों में AK सीरीज राइफल्स, अमेरिका निर्मित M सीरीज राइफल्स, जर्मन HK सीरीज असॉल्ट राइफल्स, कार्बाइन, शॉटगन, मोर्टार और RPG-7 लॉन्चर शामिल थे।
हालांकि सबसे अधिक चिंता ड्रोन जैमर की बरामदगी को लेकर जताई जा रही है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जब्त किया गया बैकपैक ड्रोन जैमर ताइवान निर्मित हो सकता है। इसके अलावा वॉकी-टॉकी के आकार के दो छोटे जैमर भी बरामद किए गए हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, ड्रोन जैमर ऐसे उपकरण होते हैं जो ड्रोन और उसके ऑपरेटर के बीच रेडियो सिग्नल को बाधित करते हैं। यह उपकरण उसी फ्रीक्वेंसी पर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल छोड़ते हैं, जिस पर ड्रोन संचालित होता है। इससे ड्रोन का वीडियो फीड और रिमोट कनेक्शन बाधित हो जाता है, जिसके बाद ड्रोन या तो गिर जाता है या अपने शुरुआती स्थान पर लौटने के लिए मजबूर हो जाता है।
इस तरह की पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर तकनीक फिलहाल भारतीय सेना की विशेष सिग्नल यूनिट्स द्वारा ही इस्तेमाल की जाती है। सेना इन्हें विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर के उत्तरी कमान क्षेत्रों में ड्रोन और IED खतरों से निपटने के लिए उपयोग करती है। एक बैकपैक जैमर की कीमत लगभग 5 से 10 लाख रुपये तक बताई जाती है। छोटे जैमर लगभग 1 किलोमीटर तक और बैकपैक जैमर करीब 5 किलोमीटर तक प्रभावी माने जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि मणिपुर में जारी जनजातीय हिंसा के बीच ड्रोन और काउंटर-ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2023 से मेइती और कुकी-जो समूहों के बीच जारी संघर्ष में व्यावसायिक ड्रोन का उपयोग किया जाता रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, कुछ उग्रवादी समूहों ने ड्रोन के जरिए गांवों और सुरक्षा बलों पर विस्फोटक गिराने की घटनाओं को अंजाम दिया है।
अब ड्रोन जैमर की मौजूदगी यह संकेत देती है कि उग्रवादी संगठन सुरक्षा बलों की निगरानी और विरोधी समूहों के ड्रोन हमलों से बचने के लिए नई तकनीकों को अपना रहे हैं।
सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि ये उपकरण म्यांमार से तस्करी कर भारत लाए गए हैं। वर्ष 2021 से म्यांमार में जारी गृहयुद्ध के दौरान ड्रोन और काउंटर-ड्रोन तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ है। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की जनवरी 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, म्यांमार दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा “ड्रोन युद्ध क्षेत्र” बन चुका है, जहां 2021 के बाद से 600 से अधिक स्थानों पर 2100 से ज्यादा ड्रोन हमले दर्ज किए गए हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, म्यांमार के विद्रोही समूह ड्रोन युद्ध में विदेशी विशेषज्ञों और भाड़े के लड़ाकों की मदद भी ले रहे हैं। मार्च 2026 में भारतीय एजेंसियों ने छह यूक्रेनी नागरिकों और एक अमेरिकी नागरिक समेत सात विदेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया था। उन पर बिना अनुमति मिजोरम में प्रवेश कर म्यांमार के विद्रोही समूहों से संपर्क करने का आरोप था।
सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह बरामदगी भारत-म्यांमार सीमा की संवेदनशीलता और हथियारों की तस्करी के बढ़ते खतरे को उजागर करती है। पूर्वोत्तर के उग्रवादी संगठन लंबे समय से म्यांमार स्थित समूहों के जरिए हथियार हासिल करते रहे हैं, लेकिन अब ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर तकनीक की तस्करी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए और गंभीर चुनौती बन सकती है।
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