भारत में हर साल औसतन 83 लाख लोगों की मौत होती है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से अब तक केवल 1.15 करोड़ आधार कार्ड ही रद्द किए गए हैं, वो भी पूरे 14 वर्षों में। यह खुलासा इंडिया टुडे टीवी द्वारा दायर कि आरटीआई (सूचना का अधिकार) के तहत हुआ है। यह स्थिति गंभीर चिंता का विषय बन गई है, क्योंकि मृतकों के आधार कार्ड सक्रिय रहने से सरकारी योजनाओं में धोखाधड़ी, सब्सिडी में फर्जीवाड़ा और पहचान का दुरुपयोग संभव हो जाता है।
UIDAI (भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण) द्वारा आरटीआई में यह स्वीकार किया गया कि 2009 से अब तक केवल 1.15 करोड़ आधार नंबर निष्क्रिय किए गए हैं, जबकि इसी अवधि में देश में करीब 11 करोड़ मौतें दर्ज हुईं होंगी (83.5 लाख प्रति वर्ष की औसत से)। इसका अर्थ है कि मृत व्यक्तियों के 90% आधार अब भी सक्रिय हो सकते हैं।
अधिकारियों ने माना कि आधार रद्द करने की प्रक्रिया बेहद कठिन और बोझिल है, जो राज्य सरकारों द्वारा जारी मृत्यु प्रमाण पत्रों और परिजनों द्वारा जानकारी देने पर निर्भर करती है। UIDAI खुद मृतकों की पहचान या सक्रिय कार्डों की संख्या पर कोई डेटा नहीं रखता, जिससे यह सिस्टम और भी अपारदर्शी बन जाता है।
मृत लोगों के आधार कार्ड सक्रिय रहने से सरकार की कई योजनाएं जैसे पेंशन, राशन, LPG सब्सिडी, छात्रवृत्ति, बैंक खातों की KYC आदि में भारी गड़बड़ियां हो सकती हैं। इसके अलावा, फर्जी पहचान का उपयोग करके वित्तीय धोखाधड़ी और सरकारी संसाधनों का गलत इस्तेमाल भी संभव है।
डेटा विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति UIDAI और राज्य नागरिक पंजीकरण प्रणाली (CRS) के बीच खराब समन्वय को दर्शाती है। उनका कहना है कि जब तक मृत्यु पंजीकरण और आधार डेटाबेस आपस में सीधे लिंक नहीं होंगे, तब तक पहचान की चोरी और योजनाओं में लीकेज को रोकना असंभव है।
आरटीआई के तहत सामने आए आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि भारत में आधार कार्ड रद्द करने की प्रक्रिया बेहद धीमी और असंतुलित है। अप्रैल 2025 तक देश की कुल जनसंख्या 146.39 करोड़ है, जबकि जून 2025 तक 142.39 करोड़ लोगों के पास आधार कार्ड मौजूद हैं।
इसके बावजूद, वर्ष 2007 से 2019 के बीच देश में औसतन हर साल 83.5 लाख लोगों की मृत्यु दर्ज की गई, जिसका अर्थ है कि पिछले 14 वर्षों में लगभग 11 करोड़ से अधिक मौतें हुई होंगी। इसके विपरीत, UIDAI ने अब तक केवल 1.15 करोड़ आधार नंबर ही निष्क्रिय किए हैं, जो कुल अनुमानित मृतकों की संख्या का मात्र 10% है। यह अंतर न केवल चिंताजनक है, बल्कि इससे यह भी स्पष्ट होता है कि देश में आधार से जुड़े डेटा और मृत्यु पंजीकरण के बीच कोई समुचित समन्वय नहीं है, जिससे पहचान से जुड़ी धोखाधड़ी और सरकारी योजनाओं में गड़बड़ियों की आशंका और अधिक बढ़ जाती है।
UIDAI की यह लापरवाही न केवल व्यवस्था की पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह लगाती है, बल्कि देश की आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े खतरे की ओर भी इशारा करती है। समय आ गया है कि UIDAI मृत्यु पंजीकरण के साथ तत्काल और स्वचालित समन्वय प्रणाली लागू करे, ताकि भविष्य में इस तरह की भयावह खामियों से बचा जा सके।
यह भी पढ़ें:
अब न्यूक्लियर, बायोलॉजिकल और रेडियोलॉजिकल खतरों से लड़ने को तैयार भारतीय नौसेना!
निमिषा प्रिया की फांसी अंतिम क्षणों में टली, भारत के ग्रैंड मुफ्ती की अपील का असर!
झारखंड: बोकारो के जंगलों में मुठभेड़, दो नक्सली ढेर, एक जवान शहीद!



