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महिलाओं को सशक्त करें, प्रतिगामी परंपराओं से मुक्त करें :- सरसंघचालक मोहन भागवत

पुरुषों का यह कहना कि वे महिलाओं का उत्थान करेंगे — यह अहंकारपूर्ण और मूर्खतापूर्ण है।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार (18 जुलाई)को कहा कि राष्ट्र की प्रगति तब तक अधूरी है, जब तक महिलाओं को सशक्त और स्वतंत्र नहीं बनाया जाता। उन्होंने जोर देकर कहा कि महिलाओं को पुराने, रूढ़िवादी रीति-रिवाजों और परंपराओं से मुक्त किया जाना चाहिए ताकि वे अपनी पूरी क्षमता के साथ समाज में योगदान दे सकें।

महाराष्ट्र के सोलापुर में गैर-लाभकारी संगठन ‘उद्योगवर्धिनी’ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए भागवत ने कहा,
“महिलाएं किसी भी समाज का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। एक पुरुष जीवन भर काम करता है, लेकिन एक महिला न केवल अंत तक काम करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देती है।” उन्होंने कहा कि मां के प्रेम और स्नेह में ही बच्चे बड़ा होकर परिपक्व बनते हैं।

भागवत ने समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक सोच पर भी करारा प्रहार किया। उन्होंने कहा, “पुरुषों का यह कहना कि वे महिलाओं का उत्थान करेंगे — यह अहंकारपूर्ण और मूर्खतापूर्ण है। महिलाओं को केवल सक्षम बनाने की आवश्यकता है। उन्हें अपने निर्णय खुद लेने दें।” RSS प्रमुख ने कहा कि ईश्वर ने महिलाओं को वह सभी गुण दिए हैं जो पुरुषों में हैं, बल्कि कुछ ऐसे अतिरिक्त गुण भी दिए हैं जो उन्हें विशेष बनाते हैं। इसलिए महिलाएं वे सभी कार्य कर सकती हैं जो पुरुष करते हैं — और उससे कहीं अधिक कार्य कर सकती है।

मोहन भागवत ने महिलाओं के सशक्तिकरण को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला बताया। उन्होंने कहा, “जब एक महिला खुद को ऊपर उठाती है, तो वह केवल खुद को नहीं, बल्कि पूरे समाज को ऊपर उठाती है।” उन्होंने ‘उद्योगवर्धिनी’ संस्था की विशेष प्रशंसा की, जो वर्षों से महिलाओं में उद्यमिता और कौशल विकास के लिए कार्य कर रही है। “यह संस्था सामाजिक परिवर्तन का आदर्श मॉडल है,” उन्होंने कहा।

इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय महिला उद्यमी, सामाजिक कार्यकर्ता और ‘उद्योगवर्धिनी’ से जुड़ी महिलाएं उपस्थित रहीं। उन्होंने भागवत के विचारों की सराहना करते हुए कहा कि महिलाओं को जब अवसर और संसाधन मिलते हैं, तब वे न केवल खुद को, बल्कि अपने परिवार, समाज और राष्ट्र को भी आगे ले जाती हैं।

मोहन भागवत का यह वक्तव्य न केवल महिलाओं की सामाजिक स्थिति को लेकर एक स्पष्ट संदेश है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सांस्कृतिक संगठनों में भी अब महिला सशक्तिकरण को लेकर सोच बदल रही है। उनके बयान ने एक बार फिर यह स्थापित किया है कि राष्ट्र की असली ताकत उसकी महिलाएं हैं — और जब वे मुक्त, सशक्त और स्वतंत्र हों, तभी भारत वास्तव में आगे बढ़ेगा।

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