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Nepal: पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली समेत चार अन्य अधिकारियों के पासपोर्ट फ्रीज !

सीपीएन-यूएमएल पार्टी पर अभी भी ओली का गहरा प्रभाव है, ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया है।

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नेपाल की अंतरिम सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और चार अन्य शीर्ष अधिकारियों के पासपोर्ट जब्त कर लिए हैं। यह कदम हाल ही में हुए जेन-जेड विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसक दमन कार्रवाई से जुड़े मामलों को लेकर उठाया गया है।

क्यों जब्त किए गए पासपोर्ट?

नेपाल के गृह मंत्रालय ने रविवार (28 सितंबर) को यह कार्रवाई न्यायिक आयोग की सिफारिश पर की। आयोग फिलहाल 8 और 9 सितंबर को हुए प्रदर्शनों की जांच कर रहा है। उन प्रदर्शनों के दौरान संसद भवन क्षेत्र न्यू बानेश्वर में पुलिस ने युवाओं पर गोलियां चलाईं, जिसमें 19 युवकों की मौके पर मौत हो गई थी। बाद में कुल 75 लोगों की मौत दर्ज की गई।

प्रदर्शनकारी युवाओं का गुस्सा भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के खिलाफ था। भारी जनदबाव के बीच सरकार गिर गई और जेन-जेड प्रदर्शनकारियों ने देश की अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को नियुक्त किया। वह नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं।

किन नेताओं और अधिकारियों पर कार्रवाई?

पासपोर्ट जब्त किए जाने वालों में तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, तत्कालीन गृहमंत्री रामेश लेखक, तत्कालीन गृह सचिव गोकर्ण मणि दुबाड़ी,  तत्कालीन राष्ट्रीय जांच विभाग प्रमुख हुतराज थापा, तत्कालीन काठमांडू के मुख्य जिला अधिकारी छबी रिजाल, शामिल हैं। जांच आयोग के सदस्य बिग्यान राज शर्मा ने बताया कि इन सभी अधिकारियों को देश छोड़ने से रोक दिया गया है और उन्हें काठमांडू घाटी से बाहर जाने की भी इजाजत नहीं होगी।

सीपीएन-यूएमएल पार्टी पर अभी भी ओली का गहरा प्रभाव है, पार्टी इस फैसले का कड़ा विरोध किया है। पार्टी ने बयान जारी कर कहा कि यह “राजनीतिक प्रतिशोध” है। वहीं, पीड़ित परिवारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि मुआवजा पर्याप्त नहीं है, दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

ओली की प्रतिक्रिया

ओली ने शनिवार (28 सितंबर) को अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए गुस्सा जताया था। उन्होंने कहा, “अब सरकार मेरी सुविधाएं छीनने, पासपोर्ट रोकने और मेरे खिलाफ मामले दर्ज करने की बात कर रही है। वे देश को असुरक्षा में धकेल रहे हैं। क्या उन्हें जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए?”

यह कार्रवाई अंतरिम सरकार का सबसे हाई-प्रोफाइल कदम मानी जा रही है। जेन-जेड विद्रोह के बाद बने नए प्रशासन ने पीड़ितों की मौतों की जांच का वादा किया था। न्यायिक आयोग 21 सितंबर को गठित हुआ था और अब धीरे-धीरे जिम्मेदार लोगों पर शिकंजा कसना शुरू कर रहा है। नेपाल के राजनीतिक भविष्य पर इसका दूरगामी असर पड़ सकता है, क्योंकि यह मामला ओली जैसे प्रभावशाली नेता को सीधे कटघरे में खड़ा करता है।

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