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Monday, October 19, 2026
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जापान में मेगाक्वेक चेतावनी से भारत में डर: ग्रेट हिमालयन अर्थक्वेक की चर्चा

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जापान में संभावित मेगाक्वेक को लेकर जारी नई चेतावनियों ने एशिया में भूकंप जोखिम पर फिर से बहस छेड़ दी है। जापान जहां पैसिफिक रिंग ऑफ फायर पर स्थित होने के कारण बड़े भूकंपों के निरंतर खतरे में रहता है, वहीं भारत के विशेषज्ञ हिमालयी क्षेत्र में किसी महाभूकंप की संभावना को लेकर नई तुलना कर रहे हैं।

“ग्रेट हिमालयन अर्थक्वेक” संभावित विशाल भूकंप को कहा जाता है, जो हिमालयी पर्वतमाला के नीचे स्थित मेन हिमालयन थ्रस्ट (MHT) पर कभी भी आ सकता है। यह वही ज़ोन है जहां भारतीय टेक्टॉनिक प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट के नीचे धंस रही है। इस प्रक्रिया में सदियों से जमा तनाव एक दिन अचानक बड़े भूकंप के रूप में टूट सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस ज़ोन में 8 या उससे अधिक तीव्रता का भूकंप आ सकता है, जो उत्तर भारत, नेपाल और आसपास के क्षेत्रों में भारी तबाही मचा सकता है। हिमालय के घनी आबादी वाले इलाकों, कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर, और भूस्खलन की आशंका के कारण यह खतरा और भी गंभीर माना जाता है। इतिहास बताता है कि यह क्षेत्र पहले भी कई बड़े भूकंप झेल चुका है, 1934 बिहार–नेपाल भूकंप (8.0), 2015 नेपाल भूकंप (7.8) इन दोनों ने बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान किया था।

नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी के डायरेक्टर डॉ. ओम प्रकाश मिश्रा के मुताबिक, फिलहाल स्थिति उतनी गंभीर नहीं दिखती। उन्होंने कहा, “इस समय लगता है कि हिमालय खुद हमें बचा रहा है। छोटे M2.5–3.5 के झटकों से तनाव धीरे-धीरे रिलीज़ हो रहा है, जिससे बड़े भूकंप की आशंका फिलहाल कम है।” वैज्ञानिक इसे ‘भूकंपीय रेंगना’ कहते हैं, ऐसी प्रक्रिया, जिसमें छोटे-छोटे झटके बड़े तनाव को धीरे-धीरे निकालते रहते हैं। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि गहरे भूगर्भीय दबाव खत्म नहीं हुए हैं और लंबे समय में बड़े भूकंप की संभावना को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता।

हाल ही में भारत ने BIS के संशोधित भूकंप डिजाइन कोड के तहत भूकंप जोखिम मानचित्र को बड़ा अपडेट दिया है। पहली बार पूरा हिमालयी आर्क सबसे खतरनाक ज़ोन VI में रखा गया है। नई मैपिंग के अनुसार, देश का 61% हिस्सा अब मध्यम से उच्च भूकंप जोखिम वाले क्षेत्र में है। यह देश की आपदा-प्रबंधन नीति में सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों में से एक माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार मॉनिटरिंग, बेहतर अर्ली वार्निंग सिस्टम, मजबूत निर्माण मानक और जन-जागरूकता—ये सभी हिमालयी क्षेत्रों के लिए अनिवार्य हैं। जैसे ही जापान अपने संभावित मेगाक्वेक की तैयारी कर रहा है, हिमालयी क्षेत्र भी चौकन्ना है। भले ही प्रकृति छोटे झटकों से थोड़ा समय दे रही हो, लेकिन अगला बड़ा भूकंप किसी भी समय आ सकता है। यह चेतावनी वैज्ञानिक समुदाय बार-बार दोहरा रहा है।

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