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पुणे पोर्श कार हिट-एंड-रन मामला: नाबालिग आरोपी के पिता समेत आठ आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज

सबूतों से छेड़छाड़ का खतरा बताया

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पुणे के बहुचर्चित पोर्श हिट-एंड-रन मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने 16 दिसंबर को एक अहम फैसला सुनाते हुए नाबालिग आरोपी के पिता सहित आठ आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत ने इस मामले में सबूतों से छेड़छाड़ की गंभीर आशंका जताते हुए कहा कि आरोपियों को जमानत दिए जाने पर अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों के प्रभावित होने की पूरी संभावना है।

न्यायमूर्ति श्याम चंदक की पीठ ने जिन आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कीं, उनमें नाबालिग आरोपी के पिता विशाल अग्रवाल, आशीष मित्तल, आदित्य सूद, अरुणकुमार सिंह और अशपाक मकानदार शामिल हैं। इसके अलावा, ससून अस्पताल के डॉक्टर अजय तवारे और डॉक्टर श्रीहरि हलनोर की जमानत याचिकाएं भी खारिज कर दी गईं। इन दोनों डॉक्टरों पर आरोप है कि उन्होंने नाबालिग आरोपी के रक्त नमूने से छेड़छाड़ की, ताकि उसके शरीर में शराब की मौजूदगी का पता न चल सके।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि नाबालिग आरोपी के पिता और अन्य लोगों द्वारा कथित तौर पर रची गई साजिश, जिसके तहत रक्त नमूने से छेड़छाड़ की गई, उन दो निर्दोष लोगों के लिए न्याय की प्रक्रिया को कमजोर करती है, जिन्होंने इस हादसे में अपनी जान गंवाई। अदालत ने टिप्पणी की कि यह कृत्य न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि पीड़ितों के प्रति घोर अन्याय भी है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आरोपियों को जमानत दी जाती है, तो वे अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं। अदालत ने कहा, “कुछ आवेदक आर्थिक रूप से काफी सक्षम हैं। यदि कड़ी शर्तों के साथ भी जमानत दी जाती है, तो उनके द्वारा अपनी धन-शक्ति और प्रभावशाली स्थिति का उपयोग कर अभियोजन के सबूतों से छेड़छाड़ किए जाने की पूरी संभावना है।”

गौरतलब है कि यह मामला 19 मई 2024 का है, जब पुणे के कल्याणी नगर इलाके में एक लग्जरी पोर्श टायकन कार ने दोपहिया वाहन को टक्कर मार दी थी। इस हादसे में दो आईटी पेशेवर, अनीश अवधिया और अश्विनी कोष्टा की मौके पर ही मौत हो गई थी। आरोप है कि यह कार एक नाबालिग चला रहा था, जो शराब के नशे में था।

इस मामले ने तब और तूल पकड़ लिया था, जब जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (जेजेबी) ने नाबालिग आरोपी को एक असामान्य शर्त के साथ जमानत दे दी थी। बोर्ड ने उसे सड़क सुरक्षा पर 300 शब्दों का निबंध लिखने का निर्देश दिया था, जिस पर देशभर में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं।

बॉम्बे हाई कोर्ट के ताजा फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में है और यह सवाल उठ रहा है कि प्रभावशाली और संपन्न आरोपियों के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और सख्ती किस तरह सुनिश्चित की जानी चाहिए। अदालत के इस आदेश को पीड़ितों के परिजनों और आम जनता द्वारा न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है।

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