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Sunday, October 25, 2026
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भारत बनेगा रैमजेट-पावर्ड आर्टिलरी शेल्स तैनात करने वाला पहला देश

80 किमी से अधिक दूरी तक माक-3 की रफ्तार से करेगा प्रहार

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रक्षा प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक अहम उपलब्धि के तहत भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बनने की ओर बढ़ रहा है, जो रैमजेट-पावर्ड 155 मिमी आर्टिलरी शेल्स को ऑपरेशनल रूप से तैनात करेगा। भारतीय सेना और IIT मद्रास के सहयोग से विकसित यह अत्याधुनिक गोला-बारूद युद्धक्षेत्र की क्षमताओं में अभूतपूर्व बदलाव लाने की क्षमता रखता है, जिसमें कहीं अधिक मारक दूरी, तेज गति और उच्च सटीकता शामिल है।

रैमजेट-पावर्ड शेल पारंपरिक आर्टिलरी गोला-बारूद की तुलना में 30–50 प्रतिशत अधिक रेंज देता है। जहां सामान्य 155 मिमी आर्टिलरी शेल्स की मारक क्षमता लगभग 40–50 किलोमीटर तक सीमित रहती है, वहीं यह नया शेल 80 किलोमीटर या उससे अधिक दूरी तक लक्ष्य भेदने में सक्षम होगा। खास बात यह है कि यह शेल माक-3 की गति, यानी ध्वनि की गति से तीन गुना तेज रफ्तार हासिल कर सकता है।

इन शेल्स को प्रिसीजन गाइडेंस किट (PGK) से लैस किया जा रहा है, जो भारत की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली NavIC पर आधारित होगी। इससे लंबी दूरी पर भी लक्ष्य की सटीकता बनाए रखना संभव होगा। यह परियोजना ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के अंतर्गत विकसित की जा रही है और इसके तहत कई विकासात्मक परीक्षण पूरे किए जा चुके हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में किए गए लाइव ट्रायल्स के दौरान इन शेल्स के प्रदर्शन को उत्साहजनक बताया गया है। फिलहाल यह प्रणाली IIT मद्रास में संरचित विकासात्मक परीक्षणों के दौर से गुजर रही है।

IIT मद्रास के एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर पी.ए.रामकृष्ण ने कहा कि एक बार पूरी तरह विकसित हो जाने के बाद भारतीय सेना इस शेल का उपयोग किसी भी 155 मिमी आर्टिलरी गन के साथ कर सकेगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस तकनीक को मौजूदा 155 मिमी शेल्स में रेट्रोफिट किया जा सकता है। इससे यह प्रणाली धनुष, के9 वज्र-टी और एम777 हॉवित्जर सहित भारतीय सेना की अधिकांश आर्टिलरी प्रणालियों के अनुकूल हो जाएगी।

अनुमान है कि इन रैमजेट-पावर्ड शेल्स को इस वर्ष या अगले वर्ष तक सेना में शामिल किया जा सकता है। परियोजना को आर्मी टेक्नोलॉजी बोर्ड की मंजूरी मिल चुकी है और अंतिम सत्यापन के बाद बड़े पैमाने पर उत्पादन की जिम्मेदारी म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड (MIL) को सौंपी जाएगी।

इस तकनीकी प्रगति के केंद्र में रामजेट इंजन है, जो एक एयर-ब्रीदिंग जेट प्रणोदन प्रणाली है। यह प्रोजेक्टाइल की तेज अग्रगामी गति का उपयोग कर हवा को संपीड़ित करता है और उसमें ईंधन मिलाकर थ्रस्ट उत्पन्न करता है। पारंपरिक टर्बोजेट इंजनों के विपरीत इसमें कंप्रेशन स्टेज में कोई घूमने वाले पुर्जे नहीं होते, जिससे यह सुपरसोनिक उड़ान के लिए अधिक प्रभावी बनता है।

अब तक रामजेट तकनीक का उपयोग मुख्य रूप से मिसाइल प्रणालियों में होता रहा है, जैसे भारत की ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल। हालांकि, आर्टिलरी शेल्स में इस तकनीक का प्रयोग एक नया और महत्वपूर्ण विकास माना जा रहा है।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस क्षमता से भारतीय सेना को रणनीतिक बढ़त मिलेगी। अधिक दूरी से लक्ष्य भेदने की क्षमता से तोपखाने को सुरक्षित स्थानों से संचालन का अवसर मिलेगा, जबकि अत्यधिक गति के कारण शत्रु की वायु रक्षा प्रणालियों के लिए इन्हें रोकना कठिन होगा। साथ ही, सटीक गाइडेंस के साथ यह प्रणाली आधुनिक युद्ध में आर्टिलरी की भूमिका को और अधिक प्रभावी और घातक बना सकती है।

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