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77वें गणतंत्र दिवस पर बोले आचार्य प्रशांत, भीतरी स्वतंत्रता के बिना गणतंत्र अधूरा है!

इसी तरह अहंकार अपने ही पंथ को सर्वश्रेष्ठ घोषित करना चाहता है, और ऐसी मानसिकता में पंथनिरपेक्षता केवल शब्द बनकर रह जाती है।

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77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर दार्शनिक और लेखक आचार्य प्रशांत ने कहा कि गणतंत्र का वास्तविक अर्थ केवल संवैधानिक ढांचे तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी शक्ति नागरिकों की भीतरी जागरूकता से आती है।

उन्होंने कहा, “रिपब्लिक का, गणराज्य का, अर्थ होता है कि आपके ऊपर कोई बाहरी ताकत राज नहीं कर सकती। कोई राजा, कोई रानी, कोई परंपरा से चली आ रही व्यवस्था आपके ऊपर राज्य नहीं करेगी। गण माने लोग, और लोग खुद अपनी व्यवस्था बनाएंगे, इसीलिए गणतंत्र के साथ लोकतंत्र चलता है।”

हालांकि, उन्होंने चेताया कि आज की सबसे बड़ी चुनौती बाहर से नहीं, भीतर से आती है। उन्होंने कहा, “जैसे जरूरी है कि बाहर से कोई राजा हम पर शासन न करे, वैसे ही बहुत जरूरी है कि भीतर से भी हमारी आदिम वृत्तियां, अनपरखी मान्यताएं, और हमारा अहंकार हम पर शासन न करें।” उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारे भीतर बैठा अज्ञान जब हमारा शोषण करता है, तब वह किसी बाहरी आक्रांता से भी अधिक खतरनाक हो जाता है।

आचार्य प्रशांत ने संविधान की प्रस्तावना पर बोलते हुए कहा, “मैं कहा करता हूं कि प्रस्तावना में ये जो कुछ शब्द आते हैं, वे संविधान का आध्यात्मिक हृदय हैं। संविधान कहता है कि ‘हम, भारत के लोग, संकल्पबद्ध होकर इस संविधान को आत्मार्पित करते हैं।’

‘हम, भारत के लोग’ का अर्थ है कि हम किसी अन्य को अपने ऊपर हावी नहीं होने दे रहे। ‘हम गंभीरता से संकल्प लेते हैं’ का अर्थ है कि संविधान हमारे संकल्प से आया है, हमारी विवशता से नहीं। और ‘हम इस संविधान को स्वयं को अर्पित करते हैं’ स्पष्ट करता है कि हम खुद तय करेंगे कि हमें कैसे जीना है।”

भीतरी और बाहरी स्वतंत्रता के संबंध पर उन्होंने गीता का उदाहरण दिया। “कुरुक्षेत्र के मैदान पर जब अर्जुन के सामने बड़ा विषम बाहरी युद्ध है, तो श्रीकृष्ण अर्जुन को यह नहीं सिखाते कि बाहरी युद्ध लड़ना कैसे है। श्रीकृष्ण अर्जुन को भीतरी ज्ञान देते हैं।” उन्होंने कहा, “जिसके पास भीतरी स्वतंत्रता होगी, उसे बाहरी तौर पर भी गुलाम नहीं बनाया जा सकता।”

संविधान के मूल आदर्शों पर उन्होंने कहा, “यह बड़ी गहरी बात है कि सामान्य अहंकार अपने जीवन में संविधान के बड़े आदर्शों जैसे समाजवाद, पंथनिरपेक्षता, बंधुत्व, समानता, स्वतंत्रता आदि को पसंद नहीं करता। इससे पता चलता है कि संविधान का आधार आध्यात्मिक है। हम कहते हैं कि हम संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य हैं। ऊंचे-ऊंचे शब्द हैं, पर क्या इनमें से कुछ भी संभव हो सकता है बिना भीतरी प्रकाश के?”

लोकतंत्र पर उन्होंने कहा, “यदि आम आदमी जगा हुआ नहीं है, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र बनकर रह जाता है।” समाजवाद पर उन्होंने कहा, “आम आदमी तो प्रसन्न ही तभी महसूस करता है जब देखता है कि पड़ोसी से ज्यादा पैसा है मेरे पास।”

इसी तरह अहंकार अपने ही पंथ को सर्वश्रेष्ठ घोषित करना चाहता है, और ऐसी मानसिकता में पंथनिरपेक्षता केवल शब्द बनकर रह जाती है। उन्होंने आगे कहा, “न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व—कितने सुंदर शब्द हैं, लेकिन इन शब्दों में अर्थ तो हमारी भीतरी रोशनी ही भर सकती है। नहीं तो बस ये बाहरी सिद्धांत बनकर रह जाएंगे, सुंदर पर बाहरी।”

उन्होंने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा, “राष्ट्र सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं होता। राष्ट्र का पहला अर्थ होता है राष्ट्र में रहने वाले लोग। ‘गण’ माने हम लोग, हम ही गण हैं। तो हमें खुद को ऊंचा उठाना होगा।” उन्होंने कहा, “महानता का दायित्व हम अतीत पर नहीं डाल सकते और न ही समाज के गिने-चुने अग्रणी लोगों पर। आम आदमी को महान बनना पड़ेगा।”

उन्होंने अध्यात्म की भूमिका स्पष्ट करते हुए कहा, “अध्यात्म शब्द बड़ा लोडेड है, बड़ा भारी है। लोग समझते हैं कि जैसे कोई बहुत दूर की या जटिल बात हो रही है। नहीं, अध्यात्म से मेरा आशय बड़ा सीधा है: स्वयं को देखना। अपनी ही कमजोरियों को आश्रय न देना। अपने ही दोषों और विकारों को समर्थन न देना। अपने ही बंधनों को सहारा न देना।”

उन्होंने कहा कि जब आम भारतीय ये करने लग जाएगा, तो भारत राष्ट्र द्रुतगति से महान होता जाएगा, और ऐसा महान कि फिर पूरी दुनिया हमसे सीखना चाहेगी, और वसुधैव कुटुंबकम की बात सचमुच सार्थक हो जाएगी।

भारतीय राष्ट्रीयता पर उन्होंने कहा, “हमारा नेशनलिज्म न तो जिन्ना वाला है, न हिटलर वाला है, न बाल्कन वाला है। वैसी राष्ट्रीयता हिंसक होती है, पर हमारी राष्ट्रीयता दुश्मन नहीं मांगती। जैसी राष्ट्रीयता हमारे संविधान में निहित है, वह पूरे विश्व के लिए कल्याणकारी होती है।”

आचार्य प्रशांत ने अपने संदेश के अंत में कहा, “अंततः सारी बात आदर्शों पर नहीं, इंसान पर आती है। हमें इंसान सही चाहिए। हमारा संविधान भी यही मांग करता है कि हमें इंसान बढ़िया चाहिए, मजबूत चाहिए, ऊंचा चाहिए, आत्मजागृत चाहिए।” उन्होंने कहा, “जब भारतीय श्रेष्ठ होगा, तो भारत को श्रेष्ठ बनाना बड़ा सरल हो जाएगा।”

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