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Saturday, October 17, 2026
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मदरसों की फंडिंग पर उत्तराखंड सरकार का बड़ा फैसला

456 मदरसों को मिलने वाली सरकारी मदद को बंद करने की तैयारी

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उत्तराखंड सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने साल 2027-28 से 456 मदरसों को मिलने वाली सरकारी मदद को बंद करने की तैयारी कर ली है। इसके लिए पुराने मदरसा बोर्ड को खत्म कर दिया गया है। अब उसकी जगह ‘उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ बनाया गया है। सरकार का कहना है कि इस फैसले से बच्चे डॉक्टर और इंजीनियर बन सकेंगे और उन्हें अच्छी नौकरियाँ मिलेंगी।

उत्तराखंड सरकार का मानना है कि नए नियम से बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा मिल सकेगी। इस नए कानून के तहत पहली से आठवीं तक के करीब 400 मदरसों को जिला स्तर से मान्यता लेनी होगी। वहीं नौवीं से बारहवीं तक के 52 बड़े मदरसों को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से जुड़ना होगा।

सरकारी नौकरियों के लिए मौलवी, आलिम और मुंशी जैसे प्रमाण पत्र आवेदन हेतु मान्य नहीं हैं। लेकिन अब राज्य बोर्ड से जुड़ने के बाद यहाँ के बच्चों के लिए सरकारी नौकरी पाना बहुत आसान हो जाएगा। वे बाकी बच्चों की तरह हर सरकारी परीक्षा में बैठ सकेंगे।

अच्छे नियम और बच्चों की पढ़ाई का पूरा ख्याल

सरकार ने मदरसों के लिए कुछ बहुत ही जरूरी और आसान नियम बनाए हैं। अब हर मदरसे के पास अपनी जमीन और हवादार कमरे होने चाहिए। वहाँ पढ़ाने वाले शिक्षकों का बीएड और टीईटी पास होना जरूरी होगा। साथ ही स्कूल में लाइब्रेरी और विज्ञान की लैब भी होनी चाहिए।

प्राधिकरण ने साफ किया है कि किसी भी मदरसे को जबरन बंद नहीं किया जाएगा। अगर कोई मदरसा इन नियमों को पूरा नहीं कर पाता है, तो वहाँ के बच्चों को दूसरे अच्छे स्कूलों में भेजा जाएगा। इससे बच्चों की पढ़ाई का नुकसान नहीं होगा। इसके अलावा मान्यता प्राप्त मदरसों को केंद्र सरकार से मिलने वाली मदद पहले की तरह मिलती रहेगी।

इस नए फैसले के पीछे एक बड़ी वजह मदरसों में बच्चों की बहुत कम संख्या होना भी है। सरकार ने हाल ही में एक सर्वे कराया था। इसमें सामने आया कि नौवीं से बारहवीं तक के 54 मदरसों में कुल मिलाकर सिर्फ 99 बच्चे ही पढ़ रहे थे। हैरान करने वाली बात यह थी कि इनमें से 30 मदरसे ऐसे थे जहाँ एक भी छात्र नहीं था। केवल 9 मदरसे ही ऐसे मिले जहाँ बच्चों की संख्या 10 से ज्यादा थी। इसी गिरते स्तर को सुधारने के लिए सरकार ने यह नया और पारदर्शी नियम लागू किया है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस बदलाव को बहुत ही सकारात्मक बताया है। उनका कहना है कि सरकार का मकसद किसी भी धर्म या परंपरा को ठेस पहुँचाना नहीं है। वे चाहते हैं कि बच्चे अपनी संस्कृति से जुड़े रहें और साथ में कंप्यूटर, गणित और विज्ञान भी सीखें। इस नए नियम से सिर्फ मुस्लिम समुदाय ही नहीं, बल्कि सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी यानी सभी 6 अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों को आगे बढ़ने का बराबर मौका मिलेगा। सरकार का पूरा ध्यान अब बच्चों के बेहतर भविष्य पर है।

इस फैसले को लेकर कुछ मुस्लिम संगठनों ने अपनी चिंता भी जताई है। मुस्लिम जमात के अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन और जमात-ए-इस्लामी के मोहम्मद सलीम का कहना है कि मदरसों में पहले से ही हिंदी और अंग्रेजी जैसे विषय पढ़ाए जा रहे हैं। उनका मानना है कि यह फैसला सही नहीं है और इस पर फिर से विचार होना चाहिए। दूसरी तरफ, ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के मौलाना साजिद रशीदी ने कहा कि जो मदरसे समाज के चंदे से चलते हैं, उन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्हें बस नए नियम से रजिस्ट्रेशन कराना होगा। इस बीच सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले की भी चर्चा हो रही है, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि सरकार पढ़ाई का स्तर सुधारने के लिए नियम बना सकती है, लेकिन अल्पसंख्यकों के अधिकारों का भी सम्मान होना चाहिए।

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