उन्होंने दवाओं पर मुनाफाखोरी, महंगी ब्रांडेड दवाओं और उनकी कीमतों में भारी अंतर का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि मरीजों को महंगी ब्रांडेड दवाएं खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, जबकि उसी गुणवत्ता और प्रभाव वाली सस्ती जेनेरिक दवाएं भी उपलब्ध होती हैं।
सदन में शून्यकाल के दौरान डॉ. कुलकर्णी ने कहा कि आज बड़ी संख्या में मरीजों को महंगी ब्रांडेड दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। मरीजों को अक्सर सस्ती जेनेरिक दवाओं की जानकारी नहीं दी जाती। कई बार डॉक्टर और दवा विक्रेता भी यह धारणा बना देते हैं कि केवल महंगी ब्रांडेड दवा ही असली और प्रभावी होती है।
उन्होंने कहा कि यह स्थिति तब है जब एक ही दवा के सक्रिय घटक, मात्रा और उपचार प्रभाव समान होते हैं, लेकिन अलग-अलग कंपनियों के ब्रांड होने के कारण उनकी कीमतों में कई गुना अंतर होता है। डॉ. कुलकर्णी ने सदन में कई उदाहरण देते हुए कहा कि एक ही दवा अलग-अलग ब्रांड के नाम पर कई गुना अधिक कीमत पर बेची जा रही है।
उन्होंने बताया कि एक दवा 25 रुपये में उपलब्ध है, जबकि उसका ब्रांडेड संस्करण 132 रुपये तक बेचा जा रहा है। टेल्मीसार्टन जैसी दवा 17 रुपये से लेकर 222 रुपये तक बिक रही है। पैंटोप्राजोल 25 रुपये की होने के बावजूद कुछ ब्रांड 150 रुपये तक बेच रहे हैं। एक जैसी दवाओं की कीमतों में इतना बड़ा अंतर मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल रहा है।
भाजपा सांसद ने कहा कि हाल ही में एक संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में दवाओं पर 600 से 1000 प्रतिशत तक मुनाफाखोरी की ओर ध्यान दिलाया है।
उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिशों का हवाला दिया। डॉ. कुलकर्णी ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आंतरिक संदर्भ मूल्य निर्धारण और वैल्यू बेस्ड प्राइसिंग जैसी व्यवस्थाओं की सिफारिश की है। उनका कहना था कि भारत को भी इन वैश्विक मानकों और अच्छी व्यवस्थाओं को अपनाना चाहिए, ताकि दवाओं की कीमतें न्यायसंगत और पारदर्शी बन सकें।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए थे। विशेष रूप से कोविड काल में दवाओं पर मुनाफे की सीमा कम करने का निर्णय लिया गया, जिससे मरीजों को सस्ती दवाएं उपलब्ध हुईं और लगभग 950 करोड़ रुपये की बचत हुई।



