धोबी घाट विवाद: बॉम्बे हाईकोर्ट ने SRA भूमि क्षेत्र के निरीक्षण के आदेश दिया!

निरीक्षण के दौरान उस स्थल की साफ-सफाई, उपयोगिता और व्यावहारिकता का मूल्यांकन किया जाएगा और अगली सुनवाई से पहले 4 अगस्त तक रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।

धोबी घाट विवाद: बॉम्बे हाईकोर्ट ने SRA भूमि क्षेत्र के निरीक्षण के आदेश दिया!

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दक्षिण मुंबई के ऐतिहासिक धोबी घाट और स्लम पुनर्विकास परियोजना के बीच लंबे समय से चल रहे भूमि विवाद में, बॉम्बे हाईकोर्ट ने धोबियों को दिए गए अस्थायी कपड़े सुखाने के स्थान का संयुक्त निरीक्षण कराने का आदेश दिया है। यह निर्देश 21 जुलाई को न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी और न्यायमूर्ति आरिफ डॉक्टर की पीठ ने दिया है।

विवादित परियोजना, श्री साईबाबा नगर एसआरए सीएचएस के नाम से प्रस्तावित पुनर्विकास योजना के तहत आती है, जो कुल 28,156.32 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैली है। इसमें से 7,724.61 वर्ग मीटर भूमि कपड़े सुखाने के लिए ऐतिहासिक रूप से आरक्षित है — जिसे धोबी समुदाय 19वीं शताब्दी से उपयोग करता रहा है। यही हिस्सा अब विवाद का केंद्र है। धोबियों का दावा है कि इस क्षेत्र को Slum Rehabilitation Authority (SRA) और डेवलपर रेजोनेंट रियल्टर्स प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड (पूर्व में ओंकार रियल्टर्स) द्वारा बिना सहमति के एसआरए परियोजना में मिला दिया गया है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आगे की सुनवाई से पहले पूरी और सही जानकारी कोर्ट के सामने प्रस्तुत की जानी चाहिए। इसके लिए कोर्ट ने एक सीनियर मास्टर और प्रोथोनोटरी के माध्यम से कोर्ट अधिकारी की नियुक्ति का आदेश दिया है, जो धोबियों को उपलब्ध कराए गए अस्थायी कपड़े सुखाने के स्थल का निरीक्षण करेगा। निरीक्षण के दौरान उस स्थल की साफ-सफाई, उपयोगिता और व्यावहारिकता का मूल्यांकन किया जाएगा और अगली सुनवाई से पहले 4 अगस्त तक रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।

धोबियों की याचिका अनिल कनोजिया और लालजी कनोजिया द्वारा दाखिल की गई है, जो मुंबई महानगरपालिका (BMC) के लाइसेंसधारी किरायेदार हैं। उन्होंने कोर्ट से मांग की है कि, 7,724.61 वर्ग मीटर कपड़ा सुखाने के क्षेत्र को डेवलपर की योजना से बाहर किया जाए। पत्थर के चबूतरों के पास बराबर का खुला स्थान उन्हें उपलब्ध कराया जाए। अस्थायी व्यवस्था के लिए मुआवजा दिया जाए। डेवलपर को अंतिम निर्णय तक उन्हें वहां से बेदखल करने से रोका जाए।याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि धोबी समुदाय के 730 सदस्यों में से 264 ने ही परियोजना को लेकर सहमति दी है। बाकी नाम फर्जी या काल्पनिक हैं।

इसके अतिरिक्त, उनका कहना है कि यह भूमि न तो झुग्गी है और न ही खाली, इसलिए इसे डेवलपमेंट कंट्रोल रेगुलेशन 33(10) के तहत विकसित नहीं किया जा सकता, जो सिर्फ झुग्गियों के लिए लागू होता है। इस ऐतिहासिक स्थल को लेकर चल रहे विवाद ने न केवल धोबी समुदाय की आजीविका को खतरे में डाला है, बल्कि मुंबई की विरासत और नगर नियोजन पर भी सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट के अगले आदेश और निरीक्षण रिपोर्ट का अब सभी पक्षों को इंतजार है, जो इस मामले में अहम भूमिका निभाएगी।

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