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Tuesday, March 10, 2026
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ईरान-अमेरिका युद्ध के चलते धीमा पड़ सकता है भारत का इंटरनेट?

समुद्र के नीचे बिछे केबल नेटवर्क पर बढ़ी चिंता

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पश्चिम एशिया में ईरान विरुद्ध अमेरिका और इजरायल के युद्ध के चलते अहम होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक चिंता का केंद्र बना हुआ है। यह जलडमरूमध्य दुनिया के तेल और गैस परिवहन के लिए जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही अहम वैश्विक इंटरनेट नेटवर्क के लिए भी माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि इस क्षेत्र में संघर्ष या नौवहन बाधित होता है तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट कनेक्टिविटी पर भी पड़ सकता है, जिसमें भारत भी शामिल है।

दरअसल, तेल टैंकरों के साथ-साथ इसी समुद्री मार्ग के नीचे समुद्र तल पर फाइबर-ऑप्टिक केबलों का घना नेटवर्क बिछा हुआ है, जो दुनिया के अधिकांश डिजिटल डेटा ट्रैफिक को वहन करता है। ई-मेल, ऑनलाइन बैंकिंग, क्लाउड कंप्यूटिंग, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट संचार जैसे अधिकांश डिजिटल लेन-देन इन्हीं केबलों के जरिए संचालित होते हैं।

भारत के इंटरनेट ट्रैफिक का अहम मार्ग:

विशेषज्ञों के मुताबिक भारत से यूरोप और पश्चिम एशिया की ओर जाने वाले इंटरनेट डेटा का बड़ा हिस्सा अरब सागर और खाड़ी क्षेत्र से होकर गुजरता है। अनुमान है कि भारत के पश्चिम की दिशा में जाने वाले करीब एक-तिहाई डेटा ट्रैफिक ऐसे केबल नेटवर्क से होकर गुजरते हैं जो होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास से गुजरते हैं। इनमें प्रमुख केबल सिस्टम SEA-ME-WE 4, I-ME-WE और फाल्कन शामिल हैं। ये नेटवर्क भारत को यूरोप, पश्चिम एशिया और वैश्विक डेटा केंद्रों से जोड़ते हैं।

सैटेलाइट के बजाय दुनिया का अधिकांश इंटरनेट ट्रैफिक समुद्र के नीचे बिछे फाइबर-ऑप्टिक केबलों के जरिए चलता है। ये केबल समुद्र तल पर हजारों किलोमीटर तक फैले होते हैं और महाद्वीपों के बीच डिजिटल संचार की रीढ़ माने जाते हैं। खाड़ी क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के कारण कई अंतरराष्ट्रीय केबल सिस्टम अपेक्षाकृत संकरे समुद्री क्षेत्र से होकर गुजरते हैं। यही कारण है कि यह इलाका एशिया, पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच डेटा ट्रांसमिशन का एक अहम डिजिटल कॉरिडोर बन गया है।

संघर्ष के दौरान केबलों को क्या खतरे होते हैं?

हालांकि इन केबल्स को मजबूत बनाया जाता है, लेकिन समुद्र के नीचे होने के कारण ये कई प्रकार के भौतिक जोखिमों के संपर्क में रहते हैं। बड़े जहाजों के लंगर समुद्र तल को खींचते हुए केबलों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। मछली पकड़ने के उपकरण, समुद्री दुर्घटनाएं या पानी के नीचे विस्फोट भी केबल लाइनों को काट सकते हैं।

इसके अलावा युद्ध या नौसैनिक गतिविधियों के दौरान समुद्र में होने वाली हलचल भी केबलों को प्रभावित कर सकती है। ऐसी स्थिति में मरम्मत जहाजों को समुद्र में भेजकर क्षतिग्रस्त हिस्से को ठीक किया जाता है, लेकिन संघर्ष क्षेत्र में यह प्रक्रिया बेहद कठिन हो जाती है।

इंटरनेट सेवाओं पर संभावित असर

यदि किसी कारण से कई केबल्स में एक साथ समस्या आती है और उनकी मरम्मत समय पर नहीं हो पाती, तो नेटवर्क क्षमता धीरे-धीरे घटने लगती है। इससे इंटरनेट की गति धीमी हो सकती है, डेटा ट्रैफिक में देरी बढ़ सकती है और कुछ मामलों में सेवा बाधित भी हो सकती है।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक इंटरनेट नेटवर्क को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि डेटा को वैकल्पिक मार्गों से भेजा जा सके। लेकिन लंबा रास्ता अपनाने से इंटरनेट की गति और लेटेंसी पर असर पड़ सकता है।

डिजिटल ट्रैफिक की तेजी से बढ़ती मांग को देखते हुए नई पीढ़ी के समुद्री केबल प्रोजेक्ट भी शुरू किए जा रहे हैं। हाल ही में सुंदर पिचाई ने नई दिल्ली की यात्रा के दौरान एक नई कनेक्टिविटी पहल की घोषणा की थी, जिसके तहत भारत को वैश्विक डिजिटल नेटवर्क से जोड़ने के लिए अतिरिक्त समुद्री केबल मार्ग विकसित किए जाएंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है तो ऊर्जा आपूर्ति के साथ-साथ वैश्विक डिजिटल अवसंरचना भी जोखिम में आ सकती है, जिससे इंटरनेट सेवाओं और अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रैफिक पर असर पड़ने की आशंका बनी रहेगी।

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