प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गुरुवार (13 नवंबर) को जेपी इंफ्राटेक लिमिटेड (Jaypee Infratech Ltd) के प्रबंध निदेशक (MD) मनोज गौर को ₹12,000 करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया। यह कार्रवाई धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत की गई है। एजेंसी के अधिकारियों के अनुसार, गौर पर होमबायर्स से जुटाए गए धन के दुरुपयोग और हेराफेरी का आरोप है। यह मामला जेपी ग्रुप की दो प्रमुख कंपनियां जेपी इंफ्राटेक लिमिटेड (JIL) और जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (JAL) से जुड़ा है।
ED की जांच के अनुसार, कंपनी ने अपने हाउसिंग प्रोजेक्ट्स के लिए हजारों खरीदारों से अग्रिम राशि ली, लेकिन परियोजनाएं या तो अधूरी रहीं या पूरी तरह ठप हो गईं। 2017 में कई FIR दर्ज की गई थीं, जब नोएडा और ग्रेटर नोएडा के सैकड़ों होमबायर्स ने विरोध प्रदर्शन किए थे। शिकायतों में धोखाधड़ी, साजिश और निवेशकों को गुमराह करने के आरोप लगाए गए थे।
सूत्रों के मुताबिक, जांच में यह पाया गया कि खरीदारों से मिले अरबों रुपये जेपी ग्रुप की अन्य सहायक कंपनियों में ट्रांसफर कर दिए गए, जिससे जेपी विशटाउन, जेपी ग्रीन्स जैसे प्रोजेक्ट अधर में लटक गए। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “मनोज गौर कंपनी के संचालन और वित्तीय निर्णयों में सीधे तौर पर शामिल थे। जांच में यह सामने आया है कि खरीदारों के पैसे को अन्य ग्रुप वेंचर्स में डायवर्ट किया गया।”
ED ने दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद और मुंबई में जेपी इंफ्राटेक, जयप्रकाश एसोसिएट्स और उनसे जुड़ी कंपनियों के 15 ठिकानों पर छापे मारे। इन तलाशी अभियानों में एजेंसी ने ₹1.7 करोड़ नकद, कई वित्तीय दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड, और प्रॉपर्टी पेपर्स जब्त किए।
ED ने यह भी बताया कि उसने उन रियल एस्टेट कंपनियों के दफ्तरों में भी छापे मारे जिनके जेपी ग्रुप से वित्तीय लेन-देन थे। इनमें गौरसन्स इंडिया प्रा.लि., गुलशन होम्ज प्रा.लि. और महागुन रियल एस्टेट प्रा.लि. शामिल हैं।
जेपी इंफ्राटेक देश के शुरुआती निजी डेवलपर्स में से एक थी, जिसने एनसीआर में बड़े इंटीग्रेटेड हाउसिंग और एक्सप्रेसवे प्रोजेक्ट शुरू किए थे। लेकिन समय पर प्रोजेक्ट पूरे न कर पाने और भारी कर्ज के चलते कंपनी 2017 में दिवालिया प्रक्रिया (Insolvency and Bankruptcy Code – IBC) में चली गई। तब से राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) में कई दौर की सुनवाई चल रही है, और कई डेवलपर्स ने कंपनी की परिसंपत्तियों में रुचि दिखाई है।
ED का कहना है कि जांच का मुख्य केंद्र यह है कि होमबायर्स और बैंकों से मिले पैसे को मकान बनाने की बजाय अन्य कंपनियों में स्थानांतरित किया गया। अब एजेंसी मनी ट्रेल ट्रैक करने, खरीदारों के फंड के डायवर्जन पैटर्न को चिन्हित करने और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच कर रही है।
जेपी ग्रुप पहले भी वित्तीय अनियमितताओं और परियोजना देरी के कारण सुर्खियों में रहा है। लेकिन मनोज गौर की गिरफ्तारी को इस लंबे चल रहे विवाद में अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई माना जा रहा है,जो रियल एस्टेट क्षेत्र में वित्तीय जवाबदेही के लिए एक सख्त संकेत है।
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