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Sunday, January 4, 2026
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रूसी तेल व्यापारियों की भारतीय कंपनियों से युआन में भुगतान की मांग!

बीजिंग-नई दिल्ली रिश्तों में नरमी के बीच बढ़ा संकेत

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रूस से तेल बेचने वाले व्यापारियों ने भारतीय सरकारी रिफाइनर कंपनियों से अब चीनी मुद्रा युआन में भुगतान करने का अनुरोध किया है। व्यापार सूत्रों के मुताबिक, यह कदम भारत-चीन संबंधों में हालिया सुधार और भुगतान प्रक्रिया को सरल बनाने की कोशिशों के रूप में देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि भारत की सबसे बड़ी सरकारी तेल कंपनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) ने हाल ही में दो से तीन रूसी तेल खेपों के भुगतान युआन में किए हैं। हालांकि कंपनी की ओर से अभी इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है।

डॉलर का वर्चस्व घटा, युआन की पकड़ बढ़ी

2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद पश्चिमी देशों ने मॉस्को पर कड़े प्रतिबंध लगाए, जिससे अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार में वैकल्पिक मुद्रा, जैसे युआन और यूएई दिरहम का उपयोग तेजी से बढ़ा। अब तक अधिकतर वैश्विक तेल सौदे अमेरिकी डॉलर में होते थे, लेकिन रूस के खिलाफ लगे प्रतिबंधों ने इस व्यवस्था को हिला दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में भी भारतीय सरकारी रिफाइनरों ने कुछ भुगतान युआन में किए थे, लेकिन भारत-चीन के बीच उस समय बढ़े तनाव के कारण सरकार ने आपत्ति जताई थी और यह प्रक्रिया रोक दी गई थी। हालांकि निजी कंपनियाँ तब भी चीनी मुद्रा में लेन-देन करती रहीं।

अब क्यों बढ़ी युआन की मांग

व्यापार सूत्रों के अनुसार, रूसी तेल व्यापारी अब भुगतान प्रक्रिया को सस्ता और सीधा बनाना चाहते हैं। अब तक उन्हें दिरहम या डॉलर में भुगतान प्राप्त कर उसे युआन में बदलना पड़ता था, ताकि बाद में रूबल में रूपांतरण किया जा सके, जो एक महंगा और जटिल रास्ता था। सीधे युआन में भुगतान से यह झंझट समाप्त हो जाएगा। साथ ही, यूरोपीय संघ द्वारा तय तेल मूल्य सीमा (price cap) के अनुपालन के लिए व्यापारी अब भी सौदों की कीमत डॉलर में तय करते हैं, लेकिन भुगतान समान मूल्य के युआन में चाहते हैं।

पश्चिमी देशों द्वारा रूस से तेल आयात बंद करने के बाद भारत ने डिस्काउंटेड रूसी तेल का सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभर आया है। अब यदि भुगतान युआन में संभव होता है, तो भारतीय सरकारी रिफाइनरों के लिए रूसी तेल की उपलब्धता और बढ़ जाएगी, क्योंकि कुछ व्यापारी अन्य मुद्राएँ स्वीकार नहीं करते।

दिलचस्प बात यह है कि यह आर्थिक कदम ऐसे समय में आया है जब भारत और चीन के बीच राजनयिक संपर्क फिर से बढ़ने लगे हैं। दोनों देशों के बीच पांच साल बाद प्रत्यक्ष उड़ानें फिर शुरू हुई हैं, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले महीने सात साल बाद चीन की यात्रा की, जहाँ उन्होंने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक में हिस्सा लिया।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह रुझान वैश्विक वित्तीय ढांचे में डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने की दिशा में एक और संकेत है।
हालाँकि भारत सरकार अब भी युआन में भुगतान को लेकर सतर्क है, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा और रियायती तेल की उपलब्धता के कारण नई दिल्ली को व्यावहारिक विकल्पों पर विचार करना पड़ रहा है।

यह स्थिति भारत के लिए राजनयिक और आर्थिक दोनों ही मोर्चों पर संतुलन साधने की चुनौती लेकर आई है,
जहाँ एक ओर अमेरिका और यूरोप रूस पर प्रतिबंध बनाए रखना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर बीजिंग और मॉस्को आर्थिक रूप से और करीब आ रहे हैं। भारत के लिए सवाल अब यह है कि क्या ऊर्जा ज़रूरतें कूटनीतिक प्राथमिकताओं पर भारी पड़ेंगी? क्या नई दिल्ली अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखेगी?

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