फार्म की प्रतिनिधि डाइगा लुबका के अनुसार, नुकसान का सही आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी। यह इस साल लातविया में घरेलू सूअरों में पाया गया आठवां एएसएफ प्रकोप है। यह बीमारी सबसे पहले 2014 में लातविया में दर्ज हुई थी और आम तौर पर जंगली सूअरों में फैलती है।
प्रभावित क्षेत्र में क्वारंटाइन सेंटर बनाए गए हैं, जहां मवेशियों और उनसे जुड़े उत्पादों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई है। आसपास के फार्मों में स्वास्थ्य और जैव सुरक्षा की जांच भी की जा रही है।
एएसएफ सूअरों में होने वाला एक अत्यधिक संक्रामक और घातक रोग है, जो खून बहने वाली बीमारी और गंभीर घाव पैदा करता है। इसके लक्षण पारंपरिक स्वाइन फीवर से मिलते-जुलते हैं।
घरेलू और जंगली सूअरों में इस वायरस की मृत्यु दर 100 प्रतिशत तक हो सकती है।
अफ्रीका में यह बीमारी लंबे समय से मौजूद है। 2007 में यह वायरस अफ्रीका से जॉर्जिया पहुंचा और उसके बाद धीरे-धीरे पूर्वी और मध्य यूरोप, रूस, एशिया (खासतौर पर चीन, जो दुनिया का सबसे बड़ा पोर्क उत्पादक है), और अमेरिका (हैती और डोमिनिकन गणराज्य) तक फैल गया।
इस बीमारी के कारण अब तक दुनिया भर में लाखों सूअरों को मारा गया है, जिससे वैश्विक पोर्क उद्योग को बड़ा झटका लगा है। हाल के वर्षों में इसके लिए कारगर और सुरक्षित टीकों का विकास हुआ है और कुछ देशों में इनके उपयोग की अनुमति भी मिल चुकी है।
1957 तक एएसएफ सिर्फ उप-सहारा अफ्रीका तक सीमित था। लेकिन, उसी वर्ष पुर्तगाल के लिस्बन हवाई अड्डे के पास हवाई जहाजों के बचे-खुचे भोजन सूअरों को खिलाने पर वहां प्रकोप हुआ। 1960 में पुर्तगाल में एक और मामला सामने आया।
1990 के दशक के मध्य तक एएसएफ इबेरियन प्रायद्वीप में लगातार मौजूद रहा।
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