अमेरिका और रूस के बीच अलास्का में हुए बहुचर्चित शिखर सम्मेलन के बाद यह सवाल और गहराता जा रहा है कि क्या रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कूटनीति के खेल में पीछे छोड़ दिया है। जहां ट्रंप ने कुछ बड़ी प्रगति की बात कही, वहीं पुतिन ने स्पष्ट किया कि युद्ध खत्म करने के लिए संघर्ष के मूल कारणों को सुलझाना ज़रूरी है।
सम्मेलन के तुरंत बाद ही रूस ने यूरोपीय शांति प्रस्तावों को खारिज कर दिया। मॉस्को ने उन सुरक्षा गारंटियों को खतरा बताया, जिन पर यूरोपीय देश जोर दे रहे थे। दूसरी ओर, यूक्रेन और यूरोप ने रूस की शर्तें मानने से इनकार कर दिया।
बीते दिनों रूस ने यूक्रेन पर एक बड़ा हवाई हमला किया, जिसमें 600 से अधिक मिसाइल और ड्रोन दागे गए। इसमें कई नागरिक बस्तियां और एक अमेरिकी स्वामित्व वाला कारखाना निशाना बने। जवाबी कार्रवाई में यूक्रेन ने रूस के कुरस्क क्षेत्र में ड्रोन हमले किए और एक परमाणु संयंत्र में आग भी लग गई।
इस बीच, ट्रंप ने रूस को युद्धविराम पर विचार करने के लिए दो हफ्तों का और समय दिया है। आलोचकों का कहना है कि यह रुख रूस के पक्ष में जाता है, खासकर तब जब ट्रंप ने रूस पर नई पाबंदियां लगाने का वादा भी टाल दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि पुतिन ने सम्मेलन के बाद अपनी स्थिति और स्पष्ट कर दी है पूरा डोनबास क्षेत्र, यूक्रेन की स्थायी तटस्थता, नाटो विस्तार पर रोक और सुरक्षा गारंटी में वीटो अधिकार।
वॉशिंगटन स्थित सेंटर फॉर अ न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी (CNAS) के शोधकर्ता निकोलस लोक्कर का कहना है, “हाल ही में क्रेमलिन ने साफ कर दिया है कि उसकी स्थिति नहीं बदली है। उसने कोई रियायत नहीं दी है। दरअसल, ऐसा लगता है कि पुतिन ने ट्रंप को बड़े पैमाने पर खेल लिया है।”
यूरोप ने अभूतपूर्व एकजुटता दिखाते हुए ट्रंप पर दबाव बनाया है कि वे जल्द से जल्द युद्धविराम सुनिश्चित करें। लेकिन ट्रंप की रणनीति अभी भी अस्पष्ट है। उन्होंने सुरक्षा गारंटियों का समर्थन तो किया है, लेकिन उनकी शर्तें धुंधली हैं।
जेएनयू के प्रोफेसर अमिताभ सिंह के अनुसार, “यूरोपीय सुरक्षा गारंटी अकेले रूस को नहीं रोक सकतीं। इसके लिए अमेरिका की सीधी या अप्रत्यक्ष भूमिका ज़रूरी है। फिलहाल ट्रंप ने नाटो से मुंह नहीं मोड़ा है और बढ़ा हुआ रक्षा खर्च सदस्य देशों ने मान लिया है।”
हालांकि, रूस का रवैया 2022 से अब तक लगभग वही है। विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि यूक्रेन तभी एक राष्ट्र के रूप में रह सकता है जब वह रूसी भाषा और संस्कृति को प्राथमिकता दे। यह संकेत है कि रूस की मांगें न तो भू-सीमा को लेकर बदली हैं और न ही यूक्रेन की भविष्य की पहचान को लेकर।
विशेषज्ञों का मानना है कि असली दबाव केवल युद्धभूमि पर बढ़त से ही बनाया जा सकता है, लेकिन पश्चिमी देशों की ओर से यूक्रेन को बड़े पैमाने पर सैन्य सहयोग मिलना अभी दूर की संभावना है। ऐसे में, समझौते की उम्मीदें फिलहाल कमजोर दिख रही हैं, जबकि पुतिन की शर्तें पहले से कहीं अधिक कड़ी हो गई हैं।
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