मध्य पूर्व में जारी युद्ध के बीच एक अहम कूटनीतिक प्रगति सामने आई है। ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच दो सप्ताह के अस्थायी युद्धविराम (सीज़फायर) पर सहमति बनी है। हालांकि, इज़राइल ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता लेबनान पर लागू नहीं होगा, जिससे क्षेत्रीय संघर्ष पूरी तरह थमने की संभावना अभी भी अनिश्चित बनी हुई है।
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने आधिकारिक रूप से इस दो हफ्ते के सीज़फायर को स्वीकार करने की पुष्टि की है। परिषद के अनुसार, इस समझौते को ईरान के नए सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह मोजतबा खामेनेई का समर्थन प्राप्त है। यह समझौता कथित रूप से पाकिस्तान की मध्यस्थता के जरिए संभव हुआ।
इससे पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया था कि यदि ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को पूरी तरह से खोलने पर सहमत होता है, तो अमेरिका हमले रोक सकता है। इसके बाद ईरान ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी इस दिशा में अहम भूमिका निभाते हुए ट्रंप से बातचीत के लिए समय सीमा बढ़ाने का अनुरोध किया था और ईरान से रणनीतिक जलमार्ग को सुचारु रूप से चालू रखने की अपील की थी।
तनाव कम करने के प्रयासों के बीच ईरान ने 10 बिंदुओं वाला एक व्यापक शांति प्रस्ताव भी रखा है, जो बातचीत का आधार बन गया है। इन शर्तों में ईरान पर हमलों की स्थायी समाप्ति, सभी क्षेत्रीय संघर्षों का अंत, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में सुरक्षित आवाजाही, ईरान के परमाणु कार्यक्रम के तहत यूरेनियम संवर्धन के अधिकार की मान्यता, सभी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को हटाना, और युद्ध से प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्निर्माण के लिए मुआवजा शामिल हैं।
हालांकि, इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस सीज़फायर का समर्थन करते हुए साफ किया है कि यह समझौता लेबनान पर लागू नहीं होगा। इसका मतलब है कि इज़राइल की लेबनान में सैन्य कार्रवाई जारी रह सकती है, विशेष रूप से हिज़्बुल्लाह के खिलाफ।
इसी बीच, ईरान में दिवंगत इस्लामी नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की मृत्यु के 40वें दिन पर समूचे ईरान में श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित होने जा रही है। 28 फरवरी को तेहरान में हुए एक हवाई हमले में अली खामनेई की मौत हो गई थी, जिसे अमेरिका और इज़राइल की संयुक्त सैन्य कार्रवाई का हिस्सा बताया गया था। ईरान में 40वां दिन मजहबी दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
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