ग्रेट निकोबार पोर्ट प्रोजेक्ट को रोकने के लिए चीन ने चलाया दुष्प्रचार अभियान

सामरिक प्रतिस्पर्धा में भारत को रोकना चाहता है चीन

ग्रेट निकोबार पोर्ट प्रोजेक्ट को रोकने के लिए चीन ने चलाया दुष्प्रचार अभियान

China launches disinformation campaign to stall Great Nicobar Port project

भारत के महत्वाकांक्षी ग्रेट निकोबार पोर्ट प्रोजेक्ट को लेकर नई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि चीन इस परियोजना को कमजोर करने के लिए दुष्प्रचार (डिसइन्फॉर्मेशन) अभियान चला रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती सामरिक मौजूदगी को चुनौती देने की व्यापक रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना को 2021 में केंद्र सरकार की मंजूरी मिली थी और इसे NITI आयोग ने तैयार किया है। लगभग ₹81,000 करोड़ (करीब 10 अरब डॉलर) की लागत वाली इस परियोजना का उद्देश्य ग्रेट निकोबार को एक प्रमुख वाणिज्यिक और सामरिक केंद्र के रूप में विकसित करना है।

इस परियोजना का मुख्य आकर्षण गैलेथिया बे में प्रस्तावित ट्रांसशिपमेंट पोर्ट है, जो 18 से 20 मीटर गहराई वाले प्राकृतिक बंदरगाह पर आधारित है। अनुमान है कि यह पोर्ट 2028 तक 40 लाख टीईयू (TEUs) कंटेनर हैंडल करेगा, जिसे 2058 तक बढ़ाकर 1.6 करोड़ टीईयू तक किया जा सकता है। इससे भारत क्षेत्रीय समुद्री व्यापार में सिंगापुर जैसे बड़े हब के समकक्ष प्रतिस्पर्धा कर सकता है।

इसके अलावा, परियोजना में 3,300 मीटर लंबा रनवे वाला एक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, 450 मेगावाट का सोलर और गैस पावर प्लांट, और अंडमान-निकोबार त्रि-सेवा कमान का विस्तार भी शामिल है। ये सभी सुविधाएं नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों की पूर्ति करेंगी, जिससे भारत की समुद्री सुरक्षा और सामरिक क्षमता मजबूत होगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की आपत्ति का मुख्य कारण इस परियोजना का भौगोलिक स्थान है। ग्रेट निकोबार, मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश मार्ग ‘सिक्स डिग्री चैनल’ के पास स्थित है, जो वैश्विक व्यापार का एक महत्वपूर्ण मार्ग है। रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन के 80% से अधिक तेल आयात और लगभग दो-तिहाई व्यापार इसी मार्ग से गुजरता है।

चीन की इस निर्भरता को पूर्व राष्ट्रपति हु जिंताओ ने 2003 में “मलक्का डिलेमा” के रूप में वर्णित किया था। ऐसे में, इस क्षेत्र में भारत की मौजूदगी को बीजिंग के लिए रणनीतिक चुनौती के रूप में देखा जाने लगा।

रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि चीन ने पर्यावरणीय चिंताओं को बढ़ावा देकर और भारत के भीतर राजनीतिक विरोध को प्रोत्साहित कर परियोजना को धीमा करने की कोशिश की है। हालांकि, भारत ने इस दिशा में कानूनी बाधाओं को काफी हद तक पार कर लिया है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal) ने हाल ही में परियोजना से जुड़ी पर्यावरणीय मंजूरी में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिससे इसके आगे बढ़ने का रास्ता साफ हुआ।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह विवाद केवल पर्यावरण या विकास का मुद्दा नहीं है, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में प्रभाव और नियंत्रण की प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत के लिए न केवल आर्थिक अवसर प्रदान करता है, बल्कि इसे एक मजबूत सामरिक शक्ति के रूप में भी देखा जा रहा है, जो भविष्य में क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकता है। इस बीच, भारत सरकार परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई दे रही है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि देश इसे अपनी समुद्री और सुरक्षा रणनीति के अहम स्तंभ के रूप में देख रहा है।

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