दशकों तक जनसंख्या नियंत्रण का प्रतीक रहा चीन आज जन्म दर बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहा है। एक समय सख्ती से लागू की गई वन चाइल्ड पॉलिसी (एक दंपत्ति के लिए एक बच्चा पैदा करने की नीति) ने जिस सामाजिक व्यवहार को अलग ही मोड़ दिया है, वही अब देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। वहीं चीन अब जन्मदर बढ़ने के लिए प्रो-बर्थ नीति अपना रहा है। हालिया कदमों में गर्भनिरोधकों पर कर छूट वापस लेना भी शामिल है, जिसने यह संकेत दिया है कि जन्मों को सीमित करने वाला राज्य अब कम होती जनसंख्या से चिंतित है।
चीन की चिंता के पीछे कठोर जनसांख्यिकीय तथ्य हैं। दशकों की सख्त नीति के बाद देश की कुल प्रजनन दर लगभग 1.15 बच्चों प्रति महिला तक गिर चुकी है, जो 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से काफी नीचे है। पिछले तीन वर्षों से चीन की कुल आबादी घट रही है, जबकि 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों का अनुपात 20 प्रतिशत से ऊपर पहुंच चुका है। इससे सार्वजनिक वित्त, स्वास्थ्य सेवाओं और पेंशन प्रणाली पर दबाव बढ़ रहा है। नीति-निर्माताओं को आशंका है कि देश अमीर बनने से पहले बूढ़ा हो सकता है।
1980 में शुरू हुई वन चाइल्ड नीति ने केवल परिवार के आकार को नहीं, बल्कि सामाजिक मानदंडों और व्यक्तिगत आकांक्षाओं को भी बदला। छोटे परिवार सामान्य बन गए, विवाह और संतान-जन्म में देरी बढ़ी और शहरीकरण के साथ बच्चों की परवरिश की लागत तेज़ी से बढ़ी। नीति समाप्त होने और दो-बच्चा व तीन-बच्चा मानदंड आने के बाद भी व्यवहार में त्वरित बदलाव नहीं हुआ। विशेषज्ञों के अनुसार, कानून बदले जा सकते हैं, लेकिन पीढ़ियों में बनी सामाजिक आदतें आसानी से नहीं पलटतीं।
जन्म दर बढ़ाने के लिए चीन ने अस्पताल प्रसव लागत घटाने, चाइल्डकेयर सब्सिडी, नकद प्रोत्साहन, प्री-स्कूल विस्तार और विवाह पंजीकरण की बाधाएं हटाने जैसे कदम उठाए। इसके बावजूद परिणाम सीमित रहे। वर्क-लाइफ बैलेंस, आवास की ऊंची कीमतें, नौकरी की अनिश्चितता और आर्थिक सुरक्षा जैसी मूल चिंताएं इन उपायों से दूर नहीं होतीं। महिलाओं पर असमान घरेलू बोझ भी माता-पिता बनने के निर्णय को और कठिन बनाता है।
यह संकट केवल चीन तक सीमित नहीं है। दक्षिण कोरिया, भारी प्रोत्साहनों के बावजूद, दुनिया की सबसे कम प्रजनन दर दर्ज कर रहा है। जापान में भी व्यापक पारिवारिक समर्थन के बावजूद जन्म दर गिरती जा रही है। यह संकेत देता है की जब सामाजिक व्यवहार संरचनात्मक रूप से बदल जाता है, तो केवल आर्थिक पैकेज पर्याप्त नहीं होते।
इसी संदर्भ में भारत पर ध्यान जाता है। हालिया आंकड़ों के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर 2.1 से नीचे फिसल चुकी है। शहरी क्षेत्रों में विवाह और पहले बच्चे की औसत आयु बढ़ रही है। यह अभी संकट नहीं है, भारत की आबादी अपेक्षाकृत युवा है, लेकिन संकेत बताते हैं कि बिना समय रहते संतुलित कदमों के, वही दबाव यहां भी उभर सकता है।
दीर्घकाल में कम जन्म दर से कार्यबल छोटा और वृद्ध आबादी बड़ी होती है, जिससे आर्थिक वृद्धि, सार्वजनिक वित्त और सामाजिक संरचनाओं पर दबाव बढ़ता है। निष्कर्ष यही है कि परिवारों के लिए बच्चों का पालन-पोषण महंगा और अनिश्चित हो गया है, जबकि देशों के लिए बच्चों का न होना दीर्घकालिक लागत लेकर आता है। चीन का अनुभव चेतावनी है कि देर से किया गया सुधार कठिन होता है। भारत के पास सीखने और समय रहते संतुलन साधने की खिड़की अभी खुली है लेकिन वह तेजी से सिमट रही है।
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