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वाणिज्यिक खदानों से कोयला उत्पादन पाँच महीनों में 11.9% बढ़ा!

कोयला मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान के अनुसार, ये सकारात्मक रुझान पूरे क्षेत्र में बेहतर परिचालन दक्षता और खनन क्षमता के अधिक प्रभावी उपयोग का संकेत देते हैं।

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वित्तीय वर्ष 2025-26 के अप्रैल से अगस्त के दौरान भारत की कैप्टिव और वाणिज्यिक खदानों से कोयला उत्पादन में पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 11.88 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि इन पांच महीनों के दौरान खदानों से कोयले की ढुलाई में 9.12 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

कोयला मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान के अनुसार, ये सकारात्मक रुझान पूरे क्षेत्र में बेहतर परिचालन दक्षता और खनन क्षमता के अधिक प्रभावी उपयोग का संकेत देते हैं।

इस वर्ष अगस्त के दौरान कोयला उत्पादन 14.43 मिलियन टन (एमटी) दर्ज किया गया, जबकि ढुलाई 15.07 मिलियन टन (एमटी) तक पहुंच गई।

कोयला उत्पादन में वृद्धि बिजली उत्पादन, स्टील मैन्युफैक्चरिंग और सीमेंट उत्पादन जैसे प्रमुख उद्योगों को कोयले की विश्वसनीय आपूर्ति सुनिश्चित करती है, जिससे भारत के औद्योगिक बुनियादी ढांचे की रीढ़ मजबूत होती है।

मंत्रालय इस क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन का श्रेय रणनीतिक नीतिगत उपायों, कठोर निगरानी और पक्षकारों को निरंतर समर्थन को दिया।

बयान में कहा गया है कि इन प्रयासों ने ऑपरेशनल एप्रूवल में तेजी लाने और उत्पादन क्षमताओं का विस्तार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे कोयला उत्पादन और ढुलाई में वृद्धि हुई है।

कोयला मंत्रालय ने वाणिज्यिक खनन शुरू करने के लिए 200 से अधिक कोयला खदानों के आवंटन की एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है, जो भारत के कोयला क्षेत्र में बदलाव की रफ्तार को दिखाता है।

कोयला मंत्रालय के अनुसार, पिछले कई वर्षों में, मंत्रालय ने वाणिज्यिक कोयला खनन की शुरुआत और सिंगल-विंडो क्लिरेंस सिस्टम से लेकर डिजिटल निगरानी और शासन उपकरणों को अपनाने तक, कई परिवर्तनकारी सुधारों की शुरुआत की है।

इन उपायों ने सामूहिक रूप से कोयला क्षेत्र के परिचालन परिदृश्य को पुनर्परिभाषित किया है, निजी उद्यम के लिए नए अवसर खोले हैं और संसाधन विकास के लिए एक अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और भविष्य के लिए तैयार ढांचा सुनिश्चित किया है।

बयान में आगे कहा गया है कि यह उपलब्धि मंत्रालय के दूरदर्शी दृष्टिकोण को दर्शाती है – जिसका उद्देश्य न केवल घरेलू कोयला उत्पादन को बढ़ाना है, बल्कि आयात पर निर्भरता कम करके और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करके राष्ट्रीय ऊर्जा मैट्रिक्स को पुनर्संतुलित करना भी है। ऐसी पहलों का संचयी प्रभाव आर्थिक विकास और रणनीतिक स्वायत्तता, दोनों को बढ़ावा देता है।

 
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