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कांग्रेस का झुकाव ईरान की ओर, मोदी सरकार पर लगाए पक्षपात न करने के आरोप

सोनिया गांधी का यह लेख कांग्रेस के पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक को लुभाने के इरादे से लिखा गया है।

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ईरान और इजरायल के बीच चल रहे तनाव के बीच कांग्रेस पार्टी एक बार फिर कटघरे में खड़ी हो गई है। कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने शनिवार (21 जून) को ‘द हिंदू’ अख़बार में लिखे अपने एक लेख में इस्लामिक रिपब्लिक ईरान का समर्थन करते हुए मोदी सरकार को निशाने पर लिया और आरोप लगाया कि सरकार ने पक्ष नहीं चुना, जिससे भारत की ‘नैतिक और कूटनीतिक विरासत’ को ठेस पहुँची है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सोनिया गांधी का यह लेख कांग्रेस के पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक को लुभाने के इरादे से लिखा गया है। उन्होंने लेख में ईरान को पश्चिमी वर्चस्व और इजरायली आक्रामकता का ‘पीड़ित’ बताया और अयातुल्ला अली खामेनेई के नेतृत्व वाली ईरान सरकार को भारत की ‘पुरानी मित्र’ बताया।

सोनिया गांधी ने लिखा, “1994 में ईरान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत के खिलाफ एक प्रस्ताव को ब्लॉक करने में मदद की थी।” लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि कश्मीर मुद्दे पर ईरान कई बार पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा रहा है। ईरानी सर्वोच्च नेता खामेनेई ने कई मौकों पर कश्मीर को ‘स्वतंत्र क्षेत्र’ बताया है और भारत पर मुस्लिमों पर अत्याचार करने के आरोप लगाए।

अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाने के बाद उन्होंने ट्वीट किया, “हमें कश्मीर में मुसलमानों की स्थिति को लेकर चिंता है। भारत सरकार को इस क्षेत्र के महान लोगों के साथ न्यायपूर्ण नीति अपनानी चाहिए और अत्याचार रोकना चाहिए।”

लेख में सोनिया गांधी ने कहा कि मोदी सरकार ने फिलीस्तीन‑इजरायल विवाद में भारत की सदियों पुरानी ‘दो‑राज्य समाधान’ की नीति को छोड़ दिया है। उन्होंने कहा, “नई दिल्ली की चुप्पी गाज़ा में तबाही और अब ईरान पर हुए हमले पर चिंताजनक है। भारत को स्पष्ट रूप से बोलना चाहिए, जिम्मेदारी से काम करना चाहिए और वेस्ट एशिया में तनाव कम करने के लिए हर राजनयिक माध्यम अपनाना चाहिए।”

कांग्रेस की यह सोच उसके नेताओं के पुराने बयानों से भी मेल खाती है। मार्च 2024 में प्रियंका गांधी ने इजरायल सरकार की आलोचना की थी। अब यह लेख कांग्रेस की मुस्लिम समर्थक छवि को और स्पष्ट करता है।

दरम्यान मोदी सरकार ने शुरू से ही एक रणनीतिक संतुलन बनाकर चल रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने यूक्रेन‑रूस युद्ध, इसराइल‑हमास संघर्ष और अब ईरान‑इजरायल संघर्ष में स्पष्ट रूप से ‘शांति’ का पक्ष लिया है।

भारत ने 7 अक्टूबर 2023 को इसराइल पर हमास के आतंकवादी हमले की निंदा की और फिलीस्तीनी नागरिकों को मानवीय सहायता भी भेजी। फरवरी 2024 में संसद में सरकार ने दो‑राज्य समाधान की नीति दोहराई और संवाद व कूटनीति से समाधान का आग्रह किया।

‘ऑपरेशन सिंधु’ के तहत भारत ने ईरान और इजरायल दोनों से भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाला। भारत ने जहां इजरायल के साथ रक्षा और खुफिया सहयोग को मज़बूत किया है, वहीं ईरान के साथ चाबहार पोर्ट और इंटरनेशनल नॉर्थ‑साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) जैसे रणनीतिक प्रोजेक्ट्स पर काम जारी है।

भारत की इस तटस्थ नीति के कारण न केवल उसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग मिल रहा है बल्कि वैश्विक मंचों पर उसकी प्रतिष्ठा भी लगातार बढ़ रही है। कांग्रेस भले ही मोदी सरकार की कूटनीतिक चुप्पी की आलोचना करे, लेकिन वक़्त ने साबित किया है कि भारत का यह संतुलन ही उसकी सबसे बड़ी ताक़त है।

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