भारतीय वायुसेना की लॉजिस्टिक क्षमता को मजबूत करने के लिए रक्षा मंत्रालय ने बड़ा फैसला लिया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने 60 मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (MTA) की खरीद को मंजूरी दे दी है। करीब ₹80,000 करोड़ के इस सौदे को हाल के वर्षों में सबसे बड़े रक्षा अधिग्रहणों में से एक माना जा रहा है।
इस फैसले का उद्देश्य भारतीय वायुसेना के पुराने हो चुके एंटोनोव AN-32 विमानों को बदलना और आधुनिक लॉजिस्टिक क्षमता विकसित करना है। 1980 के दशक में शामिल किए गए ये विमान अब तकनीकी रूप से पुराने हो चुके हैं और बढ़ती परिचालन जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं।
नई MTA परियोजना के तहत ऐसे बहुउद्देश्यीय विमानों की खरीद की जाएगी, जो कम लंबाई वाले और कच्चे रनवे पर भी काम कर सकें। ये विमान हिमालयी क्षेत्रों से लेकर द्वीपीय इलाकों तक, हर तरह के भौगोलिक वातावरण में काम करने में सक्षम होंगे। इसके जरिए सेना को तेजी से जवानों की तैनाती, उपकरणों की आपूर्ति और आपदा राहत कार्यों में मदद मिलेगी।
यह खरीद ‘वैश्विक’ श्रेणी के तहत की जाएगी, जिसमें कम से कम 30 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग अनिवार्य होगा। इस तरह की खरीद से ‘आत्मनिर्भर भारत’ की पहल में इजाफ़ा होगा और देश में रक्षा उत्पादन को मजबूती मिलेगी। इस दौड़ में एयरबस का A400M, लॉकहीड मार्टिन का C-130J सुपर हरक्यूलिस और एम्ब्रायर का KC-390 मिलेनियम प्रमुख दावेदार माने जा रहे हैं।
रक्षा सौदे के तहत न केवल विमान खरीदे जाएंगे, बल्कि स्पेयर पार्ट्स, प्रशिक्षण और इंफ्रास्ट्रक्चर भी शामिल होंगे। इसके साथ ही भारत में मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहाल (MRO) सुविधाओं के लिए संयुक्त उपक्रम स्थापित किए जाएंगे, जिससे एयरोस्पेस सेक्टर में हजारों रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना है।
स्वदेशी कंपनियों को भी इस परियोजना से बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है। टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड जैसी कंपनियां ऑफसेट कार्यक्रमों में अहम भूमिका निभा सकती हैं।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह सौदा भारत के एयरोस्पेस इकोसिस्टम को नई गति देगा और देश को रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। साथ ही भारतीय वायुसेना की लॉजिस्टिक क्षमता में वृद्धी होगी।
डिलीवरी टाइमलाइन के अनुसार पहला विमान 2028 तक पाने की उम्मीद है, जबकि पूरी फ्लीट 2035 तक शामिल करनी होगी। यह योजना वायुसेना के 2047 विजन के अनुरूप है, जिसमें मजबूत लॉजिस्टिक सपोर्ट के साथ आधुनिक एयर पावर विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।
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