बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद इस्लामिक जिहादियों द्वारा हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और उत्पीड़न को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंता है। मानवाधिकार समूहों, धार्मिक संगठनों और नागरिक समाज के नेताओं के गठबंधन ने एक आपात अंतरराष्ट्रीय अपील जारी करते हुए संयुक्त राष्ट्र, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोपीय संघ, भारत और अन्य वैश्विक शक्तियों से तत्काल और निर्णायक हस्तक्षेप की मांग की है।
यह अपील ‘हिंदूस एडवांसिंग ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव’ (HAHRI) के नेतृत्व में जारी की गई है। पत्र में कहा गया है कि मौजूदा अंतरिम सरकार के तहत हिंदू समुदाय को व्यवस्थागत उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। अंतरिम सरकार का नेतृत्व नोबेल पुरस्कार पाने वाले मुहम्मद यूनुस कर रहे हैं। हस्ताक्षरकर्ताओं ने स्थिति को नस्लीय और धार्मिक सफाए के रूप में वर्णित किया है और अल्पसंख्यक समुदाय के अस्तित्व पर खतरे की आशंका जताई है।
इस पत्र को 15 देशों के 125 से अधिक संगठनों और व्यक्तियों का समर्थन प्राप्त है। HAHRI और उसके साथियों ने चेतावनी दी है कि यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया, तो बांग्लादेश में हिंदुओं का और अधिक हाशिए पर जाना या यहां तक कि उनका लुप्त हो जाना संभव है।
पत्र में हाल ही में हुई हिंसक घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें दीपू चंद्र दास की हत्या प्रमुख है। दीपू चंद्र दास को झूठे ईशनिंदा के आरोपों के बाद सार्वजनिक रूप से बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला गया और पेड़ से लटकाकर जलाया गया।
पत्र में कहा गया, “वैश्विक हिंदू समुदाय इस बात से स्तब्ध है कि इस तथ्य को स्वीकार करने में विफलता रही है कि बांग्लादेश के हिंदू दशकों से चले आ रहे उत्पीड़न के का शिकार हैं। 1947 से पूर्वी पाकिस्तान में और 1971 में बांग्लादेश के गठन के बाद, हिंदू समुदाय को लगातार भेदभाव, हिंसा और जबरन विस्थापन का सामना करना पड़ा है। 1971 के संघर्ष के दौरान, हिंदुओं को विशेष रूप से उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाया गया। अनेक ऐतिहासिक विवरण और जीवित बचे लोगों की गवाहियां सामूहिक हत्याओं, महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा और हिंदू पुरुषों की व्यवस्थित पहचान व हत्या का दस्तावेजीकरण करती हैं। हिंदुओं के मंदिरों, घरों और व्यवसायों पर हमले किए गए हैं और वे सरकार द्वारा संरक्षण के बिना, इस्लामी कट्टरपंथियों की दया पर, लगातार भय में जीवन जी रहे हैं।”
इसी बीच बांग्लादेश में 12 फरवरी को आम चुनाव होने हैं, जिनमें जातीय संसद ‘जातीय संसद’ के सदस्यों का चयन किया जाएगा। यह 2024 में व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद शेख हसीना सरकार के सत्ता से हटने के बाद पहला राष्ट्रीय चुनाव होगा। अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन की आड़ में शेख हसीना सरकार का तख्तापलट किया गया, और उन्हें पद छोड़कर भारत में आश्रित होना पड़ा, जिसके बाद से मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम प्रशासन ने कार्यभार संभाला है।
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