अन्वेषा की खासियत इसकी हाइपरस्पेक्ट्रल तकनीक है। सामान्य कैमरे जहां केवल लाल, हरे और नीले रंग तक सीमित होते हैं, वहीं अन्वेषा के सेंसर सैकड़ों पतले स्पेक्ट्रल बैंड कैप्चर करते हैं। हर वस्तु, चाहे वह धातु हो, हथियार, वाहन, मिट्टी या पेड़, रोशनी को अलग तरीके से परावर्तित करती है। यही उसका स्पेक्ट्रल सिग्नेचर होता है। अन्वेषा इन्हीं सिग्नेचर्स के जरिए छिपी हुई गतिविधियों को भी पहचान सकता है।
सैन्य दृष्टि से यह सैटेलाइट भारतीय सेना के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। सीमा पर छिपे हथियार, टैंक, आतंकी कैंप या सैनिकों की मूवमेंट को यह कैमोफ्लाज के बावजूद पकड़ सकेगा। पाकिस्तान सीमा (LoC और IB) पर घुसपैठ, आतंकी ठिकानों और सैन्य हलचल पर नजर रखने में यह बड़ी भूमिका निभाएगा। वहीं चीन सीमा, खासकर पूर्वी लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में, सड़क निर्माण, सैन्य तैनाती और छिपे ढांचों की समय रहते पहचान संभव होगी।
देश के भीतर भी अन्वेषा की उपयोगिता कम नहीं है। नक्सल प्रभावित इलाकों में जंगलों के बीच बने कैंप, बंकर, हथियारों की मौजूदगी और नए निर्माण को यह ट्रैक कर सकेगा। ड्रग तस्करी, अवैध खनन और स्मगलिंग जैसी आपराधिक गतिविधियों पर भी इसकी नजर रहेगी। इसके अलावा कृषि, पर्यावरण निगरानी और आपदा प्रबंधन में भी इससे अहम डेटा मिलेगा।
यह सैटेलाइट 18 अन्य छोटे सैटेलाइट्स के साथ लॉन्च होगा और इसका प्रबंधन न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) करेगा। हाल के रॉकेट मिशनों से मिली सीख के बाद इसरो इस लॉन्च को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरत रहा है। अगर अन्वेषा मिशन सफल रहता है, तो यह भारत को अंतरिक्ष से निगरानी की नई ताकत देगा| एक ऐसी “स्पेस आई”, जिससे दुश्मन की हर हरकत पर नजर रखी जा सकेगी।



