अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए आदेश का असर अब अंतरराष्ट्रीय डाक सेवाओं पर साफ दिखाई देने लगा है। मेक्सिको ने बुधवार (27 अगस्त) से अमेरिका को डाक और पार्सल भेजने पर अस्थायी रोक लगाने की घोषणा की है। यह फैसला उस समय आया है जब अमेरिकी प्रशासन ने यह निर्धारित किया कि अब सभी पैकेजों पर शुल्क लगेगा, चाहे उनकी कीमत कितनी भी हो।
दरअसल, अमेरिका ने हाल ही में ‘डी मिनिमिस ट्रीटमेंट’ नामक प्रावधान समाप्त कर दिया है, जिसके तहत 800 डॉलर से कम मूल्य के सामान पर शुल्क नहीं लगता था। राष्ट्रपति ट्रंप ने पिछले महीने इस नियम को समाप्त करने वाले कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। यह छूट 29 अगस्त से खत्म हो रही है।
मेक्सिको की राष्ट्रीय डाक सेवा कोरियोस डे मेक्सिको ने कहा है कि यह रोक अस्थायी है और इसका मकसद अमेरिकी प्रशासन के नए नियमों के प्रभावों को समझना और उनकी प्रक्रिया को व्यवस्थित करना है। मेक्सिको से पहले भारत, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान और न्यूजीलैंड जैसे देश भी यही कदम उठा चुके हैं।
मंगलवार को यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (यूपीयू) ने बताया कि उसके 25 सदस्य देशों ने अमेरिका को डाक शिपमेंट भेजना बंद कर दिया है। यूपीयू ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी नियमों में बदलाव को लेकर बनी अनिश्चितता और दिक्कतें डाक सेवाओं में बड़ी रुकावट पैदा कर रही हैं। यूपीयू, जो कि डाक क्षेत्र के लिए संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसी है और जिसके 192 सदस्य देश हैं, ने कहा कि वह अमेरिकी अधिकारियों से मिलकर स्थिति को संभालने की कोशिश कर रहा है। एजेंसी ने बताया कि उसके महानिदेशक मसाहिको मेटोकी ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को पत्र लिखकर सदस्य देशों की चिंताओं से अवगत कराया है। इसमें आशंका जताई गई है कि नए नियमों से अंतरराष्ट्रीय डाक सेवाओं में भारी देरी और व्यवधान पैदा होगा।
मेक्सिकन सरकार ने कहा है कि वह अमेरिकी प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय डाक संगठनों से बातचीत कर रही है ताकि सेवाएं जल्द से जल्द फिर शुरू की जा सकें। अधिकारियों का कहना है कि उनका प्रयास यह सुनिश्चित करना है कि आम उपभोक्ताओं को परेशानी का सामना न करना पड़े और पार्सल की डिलीवरी में बाधा कम से कम हो।
अमेरिका द्वारा लगाया गया यह 50 प्रतिशत टैरिफ (पिछले सप्ताह की घोषणा के तहत) और ‘डी मिनिमिस’ छूट का खत्म होना अब अंतरराष्ट्रीय व्यापार और डाक सेवाओं पर व्यापक असर डाल सकता है। कई देशों को डर है कि इससे न केवल क्रॉस-बॉर्डर ई-कॉमर्स प्रभावित होगा बल्कि छोटे व्यापारियों और आम ग्राहकों को भी नुकसान उठाना पड़ेगा।
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