बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़ा मोड़ लाते हुए इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ऑफ बांग्लादेश (ICT-BD) ने सोमवार, 17 नवंबर को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को 2024 के छात्र आंदोलन के दौरान कथित मानवता-विरोधी अपराधों के लिए दोषी करार दिया। यह फैसला उस व्यापक सुनवाई के बाद आया है, जिसमें पिछले वर्ष हुए “जुलाई विद्रोह” के दौरान सरकारी दमन पर विस्तृत जांच की गई। हालांकि, हसीना ने अपने ऊपर लगाए गए सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल ने कहा कि हसीना के खिलाफ प्रस्तुत साक्ष्य “पर्याप्त” हैं। इसी मामले में उनके दो करीबी सहयोगी पूर्व गृह मंत्री असदुज्ज़मान खान कमाल और पूर्व पुलिस प्रमुख चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून पर भी फैसला जल्द सुनाया जाएगा। ट्रिब्यूनल ने 23 अक्टूबर को 28 कार्य-दिवसों तक चली सुनवाई पूरी की थी, जिसमें कुल 54 गवाहों ने बयान दिए।
गौरतलब है कि 5 अगस्त 2024 को जिस छात्र-नेतृत्व वाले जन आंदोलन ने हसीना सरकार को गिराया, उसी दिन वे बढ़ती अशांति के बीच बांग्लादेश छोड़कर भारत चली गई थीं। तब से वे भारत में ही रह रही हैं। विद्रोह के दौरान सरकारी कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप लगे थे। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, 15 जुलाई से 15 अगस्त 2024 के बीच “जुलाई विद्रोह” के दौरान करीब 1,400 लोगों की मौत हुई थी। रिपोर्ट का कहना है कि यह संख्या उस सुरक्षा कार्रवाई का परिणाम है, जिसे हसीना सरकार ने आंदोलन रोकने के लिए लागू किया था।
मामले में हसीना और पूर्व गृह मंत्री कमाल को भगोड़ा घोषित किया गया था और दोनों के खिलाफ मुकदमा अनुपस्थिति में चलाया गया। वहीं, पूर्व पुलिस प्रमुख चाैधरी अब्दुल्ला अल-मामून ने शुरू में अदालत में पेशी दी, लेकिन बाद में सरकारी गवाह बनने का फैसला किया।
फैसले से पहले पूरे देश में सुरक्षा व्यवस्था सख्त कर दी गई थी। ढाका मेट्रोपॉलिटन पुलिस कमिश्नर शेख मोहम्मद सज्जात अली ने रविवार शाम किसी भी व्यक्ति द्वारा आगजनी, विस्फोट या सुरक्षा बलों व नागरिकों पर हमले की कोशिश होने पर “देखते ही गोली मारने” के आदेश जारी किए। ट्रिब्यूनल परिसर के आसपास सेना, बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश और दंगा-रोधी बलों को तैनात किया गया है। राजधानी ढाका की सड़कों पर सामान्य आवागमन भी बेहद कम दिखा।
हसीना की पार्टी अवामी लीग को हाल ही में भंग कर दिया गया है, उस पार्टी ने फैसले से पहले दो दिन के बंद का आह्वान किया था। राजनीतिक तनाव, संभावित हिंसा और व्यापक सुरक्षा घेराबंदी के बीच, यह फैसला बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास में एक अहम अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है।
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