भारत–अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार करार (BTA) को लेकर देश में सार्वजनिक चर्चा तेज हो गई है। विशेष रूप से किसान समुदाय के कुछ वर्गों की ओर से इस समझौते को लेकर चिंताएं सामने आई हैं। मक्का और सोयाबीन की कीमतों में गिरावट की आशंका, विदेशी फलों के आयात से प्रतिस्पर्धा बढ़ने का डर और खाद्य तेलों के बाजार पर संभावित असर जैसे कई सवाल उठाए जा रहे हैं। ये चिंताएं स्वाभाविक भी हैं, क्योंकि भारत में खेती केवल आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि आजीविका, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण स्थिरता का महत्वपूर्ण आधार है।
हालांकि यदि इस करार की संरचना और उसमें शामिल सुरक्षा उपायों को ध्यान से देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि यह समझौता पूरी तरह खुला व्यापार नहीं है, बल्कि एक संतुलित और संरक्षित ढांचा है। केंद्र सरकार ने व्यापार के अवसर बढ़ाने और किसानों को अचानक बाजार झटकों से बचाने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है।
इस संदर्भ में सबसे पहले पशु आहार में इस्तेमाल होने वाले DDGS (Distillers Dried Grains with Solubles) के आयात का मुद्दा सामने आता है। कुछ आलोचकों का कहना है कि इसके आयात से देश में मक्का और सोयाबीन की मांग कम हो सकती है। लेकिन वास्तविकता इससे अलग है।
भारत में पशु आहार की कुल मांग लगभग 600 लाख टन के आसपास है, जबकि DDGS आयात की सीमा केवल 5 लाख टन तय की गई है। यानी कुल मांग का एक प्रतिशत से भी कम। इसके अलावा यह भी अनिवार्य किया गया है कि आयात होने वाला DDGS नॉन-LMO (नॉन-GM) होना चाहिए और इसका उपयोग केवल पशु आहार के लिए ही किया जा सकेगा।
इतनी सीमित और नियंत्रित मात्रा में आयात से घरेलू अनाज बाजार पर कोई बड़ा प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है। इसके विपरीत, पोल्ट्री, डेयरी, मत्स्य पालन और पशुपालन जैसे क्षेत्रों में पशु आहार की लागत कम हो सकती है, जिससे लाखों ग्रामीण परिवारों को फायदा मिल सकता है।
इसी तरह लाल ज्वार (Red Sorghum) के आयात को लेकर भी संतुलित नीति अपनाई गई है। इस करार में केवल 30 प्रतिशत की आंशिक शुल्क रियायत दी गई है और यह भी सिर्फ नॉन-GM लाल ज्वार के लिए, जो केवल पशु आहार के रूप में इस्तेमाल की जा सकती है।
शुल्क में इतनी अधिक कटौती नहीं की गई है कि इससे घरेलू उत्पादन को नुकसान पहुंचे। साथ ही आयात की मात्रा भी नियंत्रित है। इससे राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य प्रदेश के ज्वार उत्पादक किसानों को सुरक्षा मिलती है, जबकि पोल्ट्री उद्योग को स्थिर कीमतों का लाभ मिलता है।
सबसे अधिक राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा फलों का आयात है, खासकर सेब। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर भारत के सेब उत्पादकों को आशंका है कि विदेशी सेबों के आयात से उनके बाजार पर दबाव बढ़ सकता है।
लेकिन इस मामले में भी कई सुरक्षा उपाय लागू किए गए हैं। सेब का आयात कोटा प्रणाली के तहत किया जाएगा। पहले वर्ष में 1,00,000 मीट्रिक टन और तीसरे वर्ष से 1,50,000 मीट्रिक टन तक की सीमा तय की गई है।
इसके अलावा न्यूनतम आयात मूल्य ₹80 प्रति किलो निर्धारित किया गया है। 35 प्रतिशत शुल्क रियायत के बाद भी आयातित सेब की कीमत लगभग ₹106 प्रति किलो रहती है। यदि कोटा सीमा से अधिक आयात किया जाता है तो उस पर पूरी 50 प्रतिशत शुल्क दर लागू होती है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य स्पष्ट है-डंपिंग को रोकना, भारतीय सेबों की प्रतिस्पर्धा क्षमता बनाए रखना और कटाई के मौसम में कीमतों को गिरने से बचाना।
इसी तरह बादाम, पिस्ता, हेज़लनट और अखरोट जैसे ट्री नट्स के आयात को भी सीमित कोटा के भीतर ही अनुमति दी गई है। इससे जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के स्थानीय उत्पादकों को अनियंत्रित विदेशी प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं करना पड़ेगा।
सबसे संवेदनशील क्षेत्र खाद्य तेल का है। भारत पहले से ही हर साल लगभग 40 लाख टन सोयाबीन तेल आयात करता है। इस करार के तहत जो रियायत दी गई है, वह भारत की कुल खपत के 10 प्रतिशत से भी कम है और वह भी कोटा प्रणाली में सीमित है।
वर्तमान में खाद्य तेलों पर 35.75 प्रतिशत आयात शुल्क लागू है, जो घरेलू बाजार को पर्याप्त सुरक्षा देता है। आयात की मात्रा भी इतनी सीमित रखी गई है कि घरेलू बाजार पर अचानक दबाव न पड़े।
सोयाबीन के मामले में कुल आयात लगभग 6 लाख टन तक सीमित है, जिसमें से केवल 1 लाख टन नॉन-GM कोटा के तहत है। इससे सरसों, सूरजमुखी, तिल और मूंगफली उगाने वाले किसानों की कीमतों पर नकारात्मक असर पड़ने की संभावना कम हो जाती है।
इन सभी क्षेत्रों को देखने पर एक समान नीति दिखाई देती है- सीमित कोटा, चरणबद्ध लागू करना, न्यूनतम आयात मूल्य और नॉन-GM शर्त कोटा से अधिक आयात पर ऊंचा शुल्क| इसका मतलब यह है कि यह समझौता पूरी तरह खुला व्यापार नहीं बल्कि “मैनेज्ड इंटीग्रेशन” यानी नियंत्रित वैश्विक एकीकरण का मॉडल है।
यदि पशु आहार और खाद्य तेलों की लागत कम होती है तो इससे खाद्य महंगाई को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है। इसका फायदा सिर्फ शहरों के उपभोक्ताओं को ही नहीं बल्कि ग्रामीण परिवारों को भी मिलता है।
स्थिर उपभोक्ता कीमतें और स्थिर किसान आय- दोनों एक-दूसरे के विरोधी लक्ष्य नहीं बल्कि संतुलित अर्थव्यवस्था के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।
भारत की कृषि अर्थव्यवस्था इतनी महत्वपूर्ण है कि किसी भी व्यापार समझौते में उसके हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती। उपलब्ध संकेत बताते हैं कि केंद्र सरकार ने इस वास्तविकता को समझते हुए ही यह समझौता तैयार किया है।
सीमित कोटा और सुरक्षा उपायों के साथ बाजार पहुंच को नियंत्रित कर यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार घरेलू कृषि के पूरक के रूप में काम करे, प्रतिस्पर्धी खतरे के रूप में नहीं।
तेजी से वैश्वीकरण की ओर बढ़ती दुनिया में पूरी तरह अलग-थलग रहना संभव नहीं है। लेकिन बिना सुरक्षा के खुला व्यापार भी सही रास्ता नहीं है।
किसी भी नीति की असली कसौटी संतुलन होती है| और भारत-अमेरिका व्यापार करार के मामले में यही संतुलन सबसे महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में दिखाई देता है।
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