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अलास्का में ट्रंप-पुतिन शिखर सम्मेलन पर बवाल !

राष्ट्रवादियों की पुरानी मांग फिर गरमाई

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ शिखर वार्ता आयोजित करने का निर्णय चर्चा में है, लेकिन असली विवाद इसके स्थान अलास्का को लेकर है। अलास्का को अमेरिका ने 19वीं सदी में रूस से खरीदा था, वहीं लंबे समय से रूसी उग्र-राष्ट्रवादि इसके वापसी की मांग कर रहें है। इस पृष्ठभूमि में ट्रंप द्वारा अलास्का में सम्मेलन आयोजित करने से रूस समर्थक गुटों को अपने दावे दोहराने का मौका मिल गया है।

अमेरिका ने 1867 में रूस से अलास्का को 72 लाख डॉलर (आज की कीमत में लगभग 192 मिलियन डॉलर) में खरीदा था। रणनीतिक दृष्टि से अहम इस सौदे को रूस के राष्ट्रवादी अब भी गलती मानते हैं और इसकी वापसी की मांग करते हैं। ट्रंप के ऐलान के बाद पुतिन के सहयोगियों ने सोशल मीडिया पर अलास्का को रूसी इतिहास और संस्कृति से जोड़ने वाली तस्वीरें और दस्तावेज़ साझा करना शुरू कर दिए।

रूसी डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट फंड के सीईओ और पुतिन के विशेष दूत किरिल ए. दिमित्रिएव ने ‘एक्स’ पर लिखा — “रूसी अमेरिका के रूप में जन्मा ऑर्थोडॉक्स जड़ें, किले, फर व्यापार अलास्का इन रिश्तों की गूंज है और अमेरिका को आर्कटिक राष्ट्र बनाता है। आइए पर्यावरण, बुनियादी ढांचा और ऊर्जा पर साझेदारी करें।” विश्लेषकों के अनुसार, इस तरह की टिप्पणियां उस रणनीति का हिस्सा हो सकती हैं, जिसमें ऐतिहासिक और सांस्कृतिक तर्कों के आधार पर भूभाग पर दावा किया जाता है, जैसा रूस ने पहले जॉर्जिया और यूक्रेन में किया।

राजनीतिक टिप्पणीकार डेविड फ्रम ने व्यंग्य किया “उम्मीद है कि पुतिन अलास्का को स्मृति चिन्ह के रूप में घर ले जाने की मांग नहीं करेंगे, वरना ट्रंप शायद वह भी दे दें।” पूर्व अमेरिकी राजदूत माइकल मैकफॉल ने कहा, “ट्रंप ने पुतिन को पूर्व रूसी साम्राज्य के हिस्से में बुलाया है। क्या उन्हें पता है कि रूसी राष्ट्रवादी अलास्का को भी यूक्रेन की तरह ‘नुकसान’ मानते हैं जिसे ठीक किया जाना चाहिए?”

पत्रकार जूलिया डेविस ने कहा कि पुतिन को अमेरिका बुलाना ही निंदनीय है, लेकिन अलास्का में सम्मेलन। जबकि रूसी टीवी पर लगातार इसे वापस लेने की मांग होती है। वहीं पूर्व अमेरीकी सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन के मुताबिक, “अलास्का से भी बुरा स्थान सिर्फ मॉस्को हो सकता था।”

किंग्स कॉलेज, लंदन की प्रोफेसर रूथ डेयरमंड के अनुसार, शिखर सम्मेलन की टाइमिंग बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस दिन तय हुआ, जिस दिन रूस को युद्धविराम पर सहमत होना था। “यह पुतिन के साथ ट्रंप की नज़दीकी का साफ संकेत है और अमेरिका के लिए गहरी राजनीतिक शर्मिंदगी।”

इतिहासकार बताते हैं कि 19वीं सदी में रूस ने अलास्का इसलिए बेचा था क्योंकि यह भौगोलिक रूप से दूर, प्रशासनिक रूप से मुश्किल और आर्थिक रूप से बोझिल था। क्रीमिया युद्ध के बाद रूस ब्रिटेन के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी सतर्क था और अमेरिका को यह क्षेत्र बेचना एक सुरक्षित विकल्प माना गया।

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