अमेरिका–इजराइल के संयुक्त हमलों में ईरान की इस्लामी रिजीम सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबर के बाद इस्लामी राज्य अभूतपूर्व राजनीतिक अनिश्चितता के दौर में प्रवेश कर गया है। तीन दशक से अधिक समय तक देश की सत्ता पर कब्ज़ा रखने वाले खामेनेई के अचानक हटने से नेतृत्व की डोर ढीली पड़ चुकी है। ईरानी सेना से लेकर राजनैतिक हलकों में धुंद छाई है, जिसे हटाना ईरान की व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।
ईरान की इस्लामी राजनीतिक प्रणाली को खामेनेई और इस्लामी गणराज्य के संस्थापक अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी ने आकार दिया था,जो सर्वोच्च नेता को राज्य के सभी महत्वपूर्ण निर्णयों पर अंतिम अधिकार देती है। संविधान में उत्तराधिकार की प्रक्रिया निर्धारित है, लेकिन युद्ध जैसी परिस्थितियों में उसके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, संभावित उत्तराधिकारियों में खामेनेई के पुत्र मोजतबा खामेनेई और संस्थापक के पौत्र हसन खोमैनी के नाम पहले चर्चा में रहे हैं। हालांकि, मीडिया के मुताबिक वर्तमान में कोई भी व्यक्ति खामेनेई जैसी व्यापक वैधता और प्रभाव नहीं रखता। ऐसे में नया नेता शक्तिशाली संस्थाओं, विशेषकर रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और वरिष्ठ धर्मगुरुओं पर नियंत्रण स्थापित करने में कठिनाई का सामना कर सकता है।
ईरान में सर्वोच्च नेता की नियुक्ति का अधिकार ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ के पास है, जो वरिष्ठ आयतुल्लाओं का निकाय है और हर आठ वर्ष में चुना जाता है। वहीं ‘गार्डियन काउंसिल’ के आधे सदस्य सर्वोच्च नेता और आधे न्यायपालिका प्रमुख द्वारा नियुक्त होते हैं, संसद द्वारा पारित विधेयकों को वीटो कर सकती है और चुनावों में उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित कर सकती है। इस तंत्र के कारण निर्वाचित संस्थाओं की भूमिका सीमित मानी जाती रही है।
ईरान की न्यायपालिका शिया इस्लामी कानून की व्याख्याओं पर आधारित है और उसके प्रमुख की नियुक्ति भी सर्वोच्च नेता द्वारा की जाती है। वर्तमान प्रमुख गोलामहुसैन मोहसेनी एजई पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर चुके हैं।
रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की भूमिका
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) सीधे सर्वोच्च नेता को जवाबदेह है और निर्वाचित सरकार के नियंत्रण से बाहर संचालित होता है। रिपोर्टों के अनुसार, हालिया हमलों में IRGC कमांडर मोहम्मद पाकपुर के मारे जाने की भी खबर है, जिससे शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है।
1979 की क्रांति के बाद गठित IRGC ने 1980–88 के ईरान-इराक युद्ध के दौरान अपना प्रभाव बढ़ाया और समय के साथ यह देश की सबसे शक्तिशाली सैन्य शाखा बन गया। इसकी कुद्स फोर्स ने क्षेत्रीय रणनीति में अहम भूमिका निभाई, हालांकि हाल के वर्षों में उसे झटके लगे हैं। इसके अलावा बसीज मिलिशिया IRGC के नियंत्रण में है, यह घरेलू विरोध प्रदर्शनों को दबाने में तैनात होती है। हाल ही में बसीज मिलीशिया ने बड़े पैमाने पर आंदोलनकरियो के क़त्ल किए है।
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराधिकार की प्रक्रिया में IRGC निर्णायक भूमिका निभा सकता है, विशेषकर तब जब कई शीर्ष कमांडरों के मारे जाने की रिपोर्ट सामने आई है।
चुनाव और वास्तविक सत्ता
ईरान में राष्ट्रपति और संसद के लिए हर चार वर्ष में चुनाव होते हैं, लेकिन अंतिम अधिकार सर्वोच्च नेता के पास रहता है। 2024 में अपेक्षाकृत मध्यमार्गी माने जाने वाले राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन का चुनाव हुआ था।
बता दें की ईरान में समय के साथ चुनावी प्रक्रिया पर विश्वास कम हुआ है, विशेषकर 2009 के विवादित चुनाव परिणाम और गार्डियन काउंसिल द्वारा उम्मीदवारों की अयोग्यता के मामलों के बाद।
खामेनेई की मृत्यु ईरान की धार्मिक-राजनीतिक संरचना के लिए ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकती है। अब यह देखना होगा कि क्या असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स संवैधानिक प्रक्रिया के तहत नए नेता का चयन करती है या रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और वरिष्ठ शक्ति केंद्रों के बीच किसी नए शक्ति समीकरण का उदय होता है। पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता पर इसके दूरगामी प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
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