अमेरिका और भारत के बीच रणनीतिक संबंधों को लेकर रिपब्लिकन नेता निक्की हेली ने करारा संदेश दिया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका ने भारत को खो दिया तो यह रणनीतिक आपदा साबित होगी। हाल ही में न्यूज़वीक में लिखे अपने लेख में हेली ने कहा कि भारत को “मूल्यवान, स्वतंत्र और लोकतांत्रिक साझेदार” के रूप में देखना चाहिए और वॉशिंगटन की नीतियां इस साझेदारी को कमजोर नहीं बल्कि मजबूत करने वाली होनी चाहिए। उन्होंने भारत पर लगाए गए शुल्क और दंडात्मक कदमों की आलोचना की और सवाल उठाया कि जब चीन पर वैसी ही सख्ती नहीं दिखाई जा रही, तो भारत को क्यों निशाना बनाया जा रहा है।
हेली की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब भारत-अमेरिका संबंधों में दरारें दिख रही हैं। ट्रंप प्रशासन के पहले कार्यकाल में दोनों देशों के रिश्ते शिखर पर पहुंचे थे, लेकिन बाइडेन कार्यकाल में कई फैसलों ने नई दिल्ली को असहज किया। पाकिस्तान के एफ-16 बेड़े को फिर से सक्रिय करने के लिए 450 मिलियन डॉलर का पैकेज, बांग्लादेश की राजनीतिक उठापटक में अमेरिकी भूमिका की आशंकाएं और रूस से भारत के ऊर्जा सौदों पर अमेरिकी असहमति—इन सबने संबंधों को जटिल बना दिया।
इतिहास बताता है कि भारत-अमेरिका संबंधों ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद पड़ी खाई को भी जॉर्ज बुश प्रशासन ने पाट दिया था और आगे चलकर परमाणु समझौते से लेकर क्वाड तक, दोनों देश रणनीतिक साझेदारी में आगे बढ़े। चीन की बढ़ती चुनौती ने इस रिश्ते को और अहम बना दिया।
आज भी चीन अमेरिका का मुख्य प्रतिद्वंद्वी है, लेकिन ऐसे में भारत को नाराज़ करना वॉशिंगटन के लिए जोखिम भरा हो सकता है। हेली का कहना है कि अगर अमेरिका ने समय रहते भारत के साथ संवाद और सहयोग को प्राथमिकता नहीं दी, तो वह खुद को रूस-चीन के और करीब धकेल देगा जो वॉशिंगटन की ही रणनीति को कमजोर करेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय व्यावहारिक कूटनीति की ज़रूरत है। भारत को भी संयमित होकर अमेरिका से जुड़ाव बनाए रखना होगा, जबकि अमेरिका को यह समझना होगा कि भारत का उदय शक्ति संतुलन के लिए खतरा नहीं, बल्कि मजबूती है। हेली का संदेश साफ है। भारत को खोना अमेरिका के लिए एक ऐसी गलती होगी, जिसकी भरपाई असंभव होगी।
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