‘केरल’ से ‘केरलम’ तक; क्या है नए नाम का इतिहास

‘केरल’ से ‘केरलम’ तक; क्या है नए नाम का इतिहास

From 'Kerala' to 'Keralalam': What is the history of the new name?

24 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में केरल सरकार के उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई, जिसके तहत राज्य का आधिकारिक नाम “केरल” से बदलकर “करलम” किया जाएगा। यह निर्णय केरल विधानसभा द्वारा 2023 और जून 2024 में सर्वसम्मति से पारित प्रस्तावों के बाद लिया गया है।

अब प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति ‘केरल(नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026’ को संविधान के अनुच्छेद 3 के प्रावधानों के अनुसार राज्य विधानसभा के पास उसकी राय के लिए भेजेंगे। विधानसभा की प्रतिक्रिया मिलने के बाद विधेयक संसद में पेश किया जाएगा और अंतिम स्वीकृति के बाद संविधान की पहली अनुसूची में दर्ज नाम संशोधित किया जाएगा। 3.5 करोड़ से अधिक मलयालियों और वैश्विक प्रवासी समुदाय के लिए यह कदम केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मस्वीकृति के रूप में देखा जा रहा है।

मलयालम लिपि और उच्चारण में राज्य का नाम हमेशा “കേരളം” (केरलम) रहा है। 1956 में भाषाई आधार पर राज्य पुनर्गठन के समय मलयालम भाषियों की पहचान को मान्यता दी गई थी। ऐसे में आधिकारिक अंग्रेज़ी नाम को स्थानीय उच्चारण के अनुरूप करना कई लोगों के लिए अधूरी प्रक्रिया को पूरा करने जैसा माना जा रहा है।

मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने प्रस्ताव पेश करते समय कहा था कि राज्य का गठन ही भाषाई पहचान के सम्मान के लिए हुआ था, इसलिए संविधान में भी वही नाम परिलक्षित होना चाहिए जो जनता की बोली और परंपरा में जीवित है।

दरअसल इतिहासकारों के अनुसार, इस नाम की जड़ें 2300 वर्ष से अधिक पुरानी हैं। सम्राट अशोका के शिलालेखों में “केरलपुत्रा” का उल्लेख मिलता है, जो प्राचीन चेरा वंश से जुड़ा माना जाता है। चेरा वंश दक्षिण भारत के तीन प्रमुख तमिल राजवंशों में से एक था, जिसका उल्लेख संगम साहित्य में मिलता है।

मलयालम भाषा में कि “केरा” का अर्थ नारियल और “आलम” का अर्थ भूमि या निवास है, अर्थात “नारियल की भूमि।” राज्य की भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान में नारियल का विशेष स्थान है। वहीं अन्य व्याख्याएं इस शब्द को पर्वत और समुद्र के मिलन का स्थल या तटीय दलदली भूभाग से जोड़ती हैं।

स्थानीय लोककथाओं में परशुराम की कथा प्रचलित है, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने समुद्र में अपना फरसा फेंककर भूमि का निर्माण किया। इस नवसृजित भूमि को ही आगे चलकर ‘केरलम’ कहा गया। यह कथा आज भी त्योहारों और पारिवारिक परंपराओं में गीत, लोकगीत, नाट्य और नृत्य के माध्यम से जीवित है।

केरल के नाम में परिवर्तन की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद नया ‘केरलम’ नाम सभी आधिकारिक अभिलेखों और संवैधानिक संदर्भों में दर्ज होगा। राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले लिया गया यह निर्णय राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि इसका इतिहास लंबे समय से दुर्लक्षित रहा है।

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