देश के प्रधान न्यायाधीश बी.आर. गवई ने अपने विदाई भाषण में कहा कि वह बुलडोजर जस्टिस के खिलाफ फैसला देकर संतुष्ट हैं और यह उनके लिए गर्व की बात है कि उन्होंने हमेशा संविधान को ही अपना सबसे बड़ा मार्गदर्शक माना। शुक्रवार उनका अंतिम कार्य दिवस था और सुप्रीम कोर्ट में आयोजित विदाई समारोह में उन्होंने अपने 40 साल के विधिक सफर को याद करते हुए कहा कि उन्होंने एक जज के रूप में कभी अपनी शपथ से समझौता नहीं किया। गवई 23 नवंबर को औपचारिक रूप से सेवानिवृत्त होंगे।
उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को महज इसलिए घर से बेदखल नहीं किया जा सकता कि उस पर कानून तोड़ने का आरोप है। नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर कार्रवाई पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था, जिसमें कहा गया था कि अधिकारी खुद को अदालत की जगह नहीं रख सकते और बिना नोटिस तोड़फोड़ करना असंवैधानिक है। गवई ने याद दिलाया कि कोर्ट ने उस फैसले में 15 गाइडलाइंस दी थीं ताकि प्रशासनिक मनमानी पर रोक लग सके और यह तय हो सके कि नोटिस, सुनवाई और प्रक्रिया के बिना किसी भी तरह की कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के खिलाफ होगी। उन्होंने कहा कि यह फैसला सिर्फ एक मामले का निर्णय नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करने का प्रयास था कि किसी की भी गरिमा और रहने का अधिकार मनमाने ढंग से छीना न जाए।
अपने बहुचर्चित क्रीमी लेयर फैसले का जिक्र करते हुए गवई ने कहा कि उन्होंने यह फैसला समानता के वास्तविक अर्थ को ध्यान में रखकर दिया था। उन्होंने बताया कि उनके ही समुदाय के कई लोगों ने उनकी आलोचना की, लेकिन उनका मानना है कि सेंट स्टीफंस जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में पढ़ने वाले किसी वरिष्ठ अधिकारी के बेटे को उसी स्तर के अवसर नहीं मिलते जो एक खेतिहर मजदूर या ग्रामीण स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे को मिलते हैं। उन्होंने कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने बराबरी का जो विचार दिया था, वह यही था कि जो पीछे रह गए हैं, उन्हें विशेष सहारा मिले, ताकि समाज में वास्तविक समानता पैदा हो सके। उन्होंने एक घटना सुनाई कि उनके एक लॉ क्लर्क, जो अनुसूचित जाति से थे और बेहतरीन शिक्षा पा चुके थे, ने उनसे कहा कि वे अब आगे आरक्षण का लाभ नहीं लेना चाहते। गवई ने कहा कि समाज में असमानता और अवसरों की वास्तविकता को समझने के लिए यह उदाहरण काफी है।
CJI गवई ने एक ऐसे मामले का भी जिक्र किया जिसमें उन्हें रात में जमानत पर फैसला देना पड़ा। उन्होंने कहा कि एक अन्य जज ने किसी व्यक्ति को 48 घंटे का भी संरक्षण देने से इनकार कर दिया था। ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप ज़रूरी था, क्योंकि यदि कोई व्यक्ति बिना ट्रायल के लंबे समय तक जेल में बंद रखा जाता है, तो यह मूल रूप से बिना ट्रायल की सजा देने जैसा है। उन्होंने कहा कि संविधान के संरक्षक के रूप में सुप्रीम कोर्ट तभी अपनी भूमिका निभाता है जब वह ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर लोगों की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करता है।
अपनी विदाई में उन्होंने अपने माता-पिता और संविधान के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि उनके पिता सार्वजनिक जीवन में गहराई से जुड़े थे और इसी कारण बचपन से ही उनके मन में संविधान के मूल्य रचे-बसे थे। वे राजनीति में भी जा सकते थे, लेकिन 1990 में परिस्थितियों ने उन्हें पूरी तरह विधिक पेशे की दिशा में मोड़ दिया और यहीं से उनका न्यायिक सफर शुरू हुआ। उन्होंने कहा कि उनकी मां ने उन्हें मेहनत और अनुशासन का महत्व समझाया, जिन्हें वे अपने साथ लेकर चलते रहे।
अंत में CJI गवई ने कहा कि वे 18 साल वकील रहे और 22 साल छह दिन जज रहे। इस दौरान उन्होंने अपनी शपथ और संविधान के प्रति निष्ठा को कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके कुछ फैसलों की आलोचना हुई, लेकिन उन्होंने कभी उसका उत्तर नहीं दिया, क्योंकि एक जज के लिए उसका काम बोलता है, न कि उसका बचाव। उन्होंने कहा कि उन्हें संतोष है कि वह अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए हमेशा संविधान के सहारे चले और इसी वजह से उनका सफर सार्थक रहा।
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