सुप्रीम कोर्ट ने पाकिस्तान से भारत आए अनुसूचित जाति के दलित हिंदुओं के मुद्दे पर केंद्र सरकार को कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल भारतीय नागरिकता देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इन समुदायों को सम्मानजनक आवास और पुनर्वास भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने दिल्ली के मजनूं का टीला इलाके में रह रहे इन परिवारों की संभावित बेदखली पर फिलहाल रोक लगा दी है और सरकार से चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा है।
सोमवार (2 फरवरी)को मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली के सिग्नेचर ब्रिज के पास मजनूं का टीला क्षेत्र में रह रहे पाकिस्तान-प्रवासी दलित हिंदू परिवारों के विस्थापन की आशंका जताई थी, जिसके बाद सर्वोच्च न्यायलय से यह टिप्पणी आई। न्यायमूर्ति एमएम सुंदरैश और न्यायमूर्ति एन कोटेश्वर सिंह की पीठ ने इस बात पर चिंता जताई कि भारतीय नागरिकता मिलने के बावजूद ये परिवार अब भी बेदखली के खतरे में हैं।
पीठ ने स्पष्ट किया कि नागरिकता के साथ-साथ राज्य की यह जिम्मेदारी भी बनती है कि वह ऐसे समुदायों को बुनियादी सुविधाओं के साथ सुरक्षित और गरिमापूर्ण जीवन जीने का अवसर दे। अदालत ने कहा कि बिना वैकल्पिक व्यवस्था के लोगों को हटाना उनके मौलिक अधिकारों और मानवीय गरिमा के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।
250 परिवारों को अंतरिम राहत:
सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश से करीब 250 परिवारों, यानी 1,000 से अधिक लोगों को राहत मिली है। ये परिवार कई वर्षों से मजनूं का टीला इलाके में रह रहे हैं और हाल के समय में विकास परियोजनाओं और बेदखली अभियानों के चलते भविष्य को लेकर अनिश्चितता का सामना कर रहे थे।
अदालत ने निर्देश दिया है कि सरकार जब तक अपना विस्तृत जवाब दाखिल नहीं कर देती, तब तक कोई भी बेदखली अभियान या ऐसा विकास कार्य नहीं किया जाएगा, जिससे इन परिवारों का विस्थापन हो सकता है। यह रोक अस्थायी है, लेकिन इसका उद्देश्य स्थिति को यथास्थिति में बनाए रखना और प्रभावित लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है।
नागरिकता के बाद पुनर्वास का सवाल:
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि पाकिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए दलित हिंदुओं को नागरिकता देने के बाद उनकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पीठ के अनुसार, यदि ऐसे नागरिकों को सिर छुपाने की जगह और बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलतीं, तो नागरिकता का लाभ अधूरा रह जाता है।
मामले में केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों को चार सप्ताह के भीतर अपना पक्ष और पुनर्वास से जुड़ी योजनाओं की जानकारी अदालत के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया है। इसमें यह भी स्पष्ट करना होगा कि इन परिवारों के लिए वैकल्पिक आवास और पुनर्वास की क्या व्यवस्था की जा रही है।
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