दिल्ली में बिगड़ती हवा की गुणवत्ता को देखते हुए स्कूलों में सभी आउटडोर गतिविधियों पर तुरंत रोक लगा दी गई है। यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देशों के बाद की गई, जिसने कहा गया कि नवंबर–दिसंबर के महीनों में बच्चों को खेल और अन्य बाहरी गतिविधियों के लिए बाहर भेजना स्कूल के बच्चों को गैस चैंबर में डालने जैसा है। अदालत का यह बयान राजधानी की जहरीली हवा पर व्यवस्था की सुस्ती को उजागर करता है।
इससे एक दिन पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने भी बच्चों की सेहत को लेकर दिल्ली सरकार पर गंभीर सवाल उठाए थे।
गुरुवार (20 नवंबर)को नाबालिग छात्रों की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सचिन दत्ता ने पूछा कि जब नवंबर से जनवरी दिल्ली के सबसे जहरीले महीने होते हैं, तो सरकार कैसे इन महीनों में आउटडोर स्पोर्ट्स आयोजित कर सकती है ?
उन्होंने कहा कि बच्चों को इन महीनों में “किसी भी आउटडोर स्पोर्ट्स में हिस्सा नहीं लेना चाहिए और यह कि खेल कैलेंडर को तुरंत संशोधित कर इन महीनों को बाहर रखा जाए। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि “अधिकारियों ने बच्चों के स्वास्थ्य की सुरक्षा करने में विफलता दिखाई है।”
याचिकाकर्ता की वकील ने बताया कि कई स्कूल इस महीने भी आउटडोर खेल आयोजित कर रहे हैं, जबकि एयर क्वालिटी ‘बहुत खराब’ श्रेणी में है। उन्होंने एक विशेषज्ञ की ओर से साझा की गई वह तस्वीर भी अदालत को दिखाई जिसमें सूक्ष्म कणों के असर से बच्चों के फेफड़ों को नुकसान स्पष्ट दिख रहा था।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की बिगड़ती हवा पर स्वतः संज्ञान लेते हुए CAQM को निर्देश दिया कि स्कूलों में होने वाले सभी खेल आयोजनों को साफ हवा वाले महीनों में शिफ्ट किया जाए। बेंच ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मौसम में बच्चों को बाहर भेजना गैस चैंबर में धकेलने जैसा है, और इसका सीधा असर आने वाले वर्षों तक उनके स्वास्थ्य पर पड़ेगा।
बीते सप्ताह दिल्ली का AQI ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुंच गया था, ऐसे स्तर पर स्वस्थ वयस्कों को भी घर में रहने की सलाह दी जाती है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि बच्चे वयस्कों की तुलना में कहीं ज्यादा संवेदनशील होते हैं उनके फेफड़े विकसित हो रहे हैं, वे तेज सांस लेते हैं और छोटे शरीर में अधिक प्रदूषक जमा होते हैं।
अध्ययनों के अनुसार लंबे समय तक PM2.5 और PM10 के संपर्क में रहने से बच्चों की फेफड़ों की क्षमता घट सकती है, अस्थमा की शुरुआत हो सकती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ जाती है और संज्ञानात्मक विकास पर भी असर पड़ सकता है। बाल रोग विशेषज्ञ हर साल नवंबर में मरीजों की संख्या में 30–40% तक बढ़ोतरी दर्ज करते हैं।
जैसे-जैसे दिल्ली एक और प्रदूषित सर्दी में प्रवेश कर रही है, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों का संदेश बेहद स्पष्ट है—
बच्चों को इस जहरीली हवा में धकेलकर व्यवस्था सामान्य रूप से चलाने की कोशिश अब स्वीकार्य नहीं है। अगर सरकार ने तुरंत और ठोस कदम नहीं उठाए, तो अदालतों की गैस चैंबर जैसी चेतावनी जल्द ही एक पूरी पीढ़ी की वास्तविकता बन सकती है।
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