भारत की रक्षा निर्यात महत्वाकांक्षाओं को एक बड़ा प्रोत्साहन मिल रहा है। आर्मेनिया में स्वदेशी एडवांस्ड टोइड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS) के सफल प्रदर्शन के बाद मध्य पूर्व के कई देशों ने भारतीय तोपखाना प्रणालियों में गहरी रुचि दिखानी शुरू कर दी है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, आर्मेनिया में युद्ध जैसी परिस्थितियों में ATAGS की विश्वसनीयता और क्षमता साबित होने के बाद यह रुचि औपचारिक बातचीत के चरण में पहुंच रही है।
155 मिमी/52 कैलिबर ATAGS को डीआरडीओ ने भारत फोर्ज और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स के साथ मिलकर विकसित किया है, जो अब भारतीय तोपखाना क्षमता की रीढ़ के रूप में उभर रहा है। पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में हुए परीक्षणों में इस सिस्टम ने 48 किलोमीटर से अधिक की मारक क्षमता, उच्च सटीकता और विभिन्न भू-भागों में बेहतर गतिशीलता का प्रदर्शन किया। यही क्षमताएं आर्मेनिया में इसके उपयोग के दौरान भी सामने आईं।
आर्मेनिया ने पहले चरण में ATAGS की छह यूनिट्स शामिल कीं और इसके बाद लगभग 155 मिलियन डॉलर के सौदे के तहत 84 अतिरिक्त यूनिट्स का ऑर्डर दिया। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, यह ऑर्डर केवल व्यावसायिक सौदा नहीं बल्कि भारतीय हथियार प्रणालियों पर भरोसे की ठोस मुहर है।
रक्षा सूत्रों का कहना है कि इस सफलता के बाद मध्य पूर्व के दो से तीन देश शुरुआती पूछताछ से आगे बढ़कर विस्तृत तकनीकी ब्रीफिंग और मूल्यांकन के चरण में पहुंच चुके हैं। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) उन प्रमुख देशों में शामिल हैं, जिन्होंने ATAGS और अन्य भारतीय आर्टिलरी सिस्टम्स में विशेष दिलचस्पी दिखाई है। इन देशों का भारत के साथ पहले से रक्षा सहयोग और ट्रायल अनुभव रहा है, जिससे नए सौदों की संभावना मजबूत मानी जा रही है।
भारत का आर्टिलरी पोर्टफोलियो केवल ATAGS तक सीमित नहीं है। इसमें कल्याणी ग्रुप का MArG 155 माउंटेड गन सिस्टम, उच्च पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर और प्रिसिजन-गाइडेड म्यूनिशन शामिल हैं। ये प्रणालियां रेगिस्तानी युद्ध, पहाड़ी रक्षा और “शूट एंड स्कूट” जैसी आधुनिक सैन्य जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित की गई हैं। नाटो मानकों के अनुरूप इंटरऑपरेबिलिटी, अपेक्षाकृत कम लागत और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश इन्हें पश्चिमी विकल्पों की तुलना में अधिक आकर्षक बनाती है।
भू-राजनीतिक बदलावों के दौर में, जब मध्य पूर्व के देश अपनी सेनाओं का तेजी से आधुनिकीकरण कर रहे हैं, भारत को एक विश्वसनीय और तटस्थ रक्षा आपूर्तिकर्ता के रूप में देखा जा रहा है। भारतीय प्रणालियों की कीमतें कई पश्चिमी विकल्पों से 30–40 प्रतिशत तक कम बताई जाती हैं, जबकि प्रदर्शन और गुणवत्ता से समझौता नहीं होता।
रक्षा अधिकारियों को उम्मीद है कि चल रही उच्च-स्तरीय चर्चाएं ठोस अनुबंधों में बदल सकती हैं। इससे भारत के 2028–29 तक ₹50,000 करोड़ के वार्षिक रक्षा निर्यात लक्ष्य को गति मिलेगी। ATAGS की आर्मेनिया में मिली सफलता भारत के परिपक्व होते रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र का प्रतीक मानी जा रही है, जहां डीआरडीओ और निजी उद्योग की साझेदारी से वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी हथियार प्रणालियां विकसित हो रही हैं।
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