सुप्रीम कोर्ट ने मेधा पाटकर की दोषसिद्धी रखी बरकरार !

हटाया एक लाख रुपये का जुर्माना

सुप्रीम कोर्ट ने मेधा पाटकर की दोषसिद्धी रखी बरकरार !

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नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता और सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को दिल्ली के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना द्वारा दायर मानहानि मामले में मिली दोषसिद्धि को सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (11 अगस्त) को बरकरार रखा है। हालांकि, अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाए गए एक लाख रुपये के जुर्माने को हटा दिया। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने ट्रायल कोर्ट के प्रोबेशन आदेश में भी संशोधन किया। पहले आदेश के तहत पाटकर को समय-समय पर अदालत में पेश होना होता था, जिसे बदलकर अब सिर्फ बांड भरने की अनुमति दी गई है। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें जेल की सजा से छूट देते हुए प्रोबेशन पर रिहा किया था।

यह मामला नवंबर 2000 के एक प्रेस नोट से जुड़ा है, जिसका शीर्षक था “सच्चा देशभक्त कौन”। इसमें पाटकर ने आरोप लगाया था कि सक्सेना हवाला लेन-देन में शामिल रहे, उन्होंने नर्मदा बचाओ आंदोलन को ₹40,000 का चेक दिया जो खाते के अस्तित्व न होने के कारण बाउंस हो गया, और उन्हें कायर तथा ‘वे देशभक्त नहीं’ कहा था। उस समय सक्सेना अहमदाबाद स्थित एनजीओ नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज के प्रमुख थे।

अप्रैल 2025 में ट्रायल कोर्ट ने पाटकर को भारतीय दंड संहिता की धारा 500 (आपराधिक मानहानि) के तहत दोषी ठहराया। अदालत ने कहा कि उनके बयान जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण थे, जिनका उद्देश्य सक्सेना की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाना और उनकी साख को नुकसान पहुंचाना था। हाई कोर्ट ने अप्रैल में उनकी सजा पर रोक लगाते हुए ₹25,000 के निजी मुचलके पर जमानत दी थी।

सुप्रीम कोर्ट में पाटकर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने दलील दी कि अपीलीय अदालत ने दो प्रमुख गवाहों की गवाही को अविश्वसनीय माना था और अहम सबूत माने गए ईमेल को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी के तहत प्रमाणित नहीं किया गया था, जिससे वह अस्वीकार्य था। वहीं सक्सेना की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनींदर सिंह ने कम से कम प्रतीकात्मक जुर्माना लगाने की मांग की। हालांकि, बेंच ने दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने से इनकार किया, लेकिन जुर्माना आदेश को हटा दिया।

दिल्ली हाई कोर्ट ने 29 जुलाई 2025 को पाटकर की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश में किसी भी प्रकार की कानूनी त्रुटि या प्रक्रिया संबंधी खामी से इनकार किया था। हाई कोर्ट ने प्रोबेशन की शर्त में संशोधन कर उन्हें हर तीन महीने में पेश होने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग या वकील के माध्यम से प्रतिनिधित्व का विकल्प दिया था।

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