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Friday, February 20, 2026
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चिराग पासवान, अखिलेश यादव और अनुप्रिया का उद्धव से क्या है कनेक्शन? 

जब इन नेताओं की पार्टी में पड़ी फूट       

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उद्धव ठाकरे से पार्टी का नाम और सिंबल छीन जाने के बाद महाराष्ट्र में हंगामा मचा हुआ है। हालांकि, उद्धव ठाकरे गुट ने चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गया। लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिली। कोर्ट ने तुरंत सुनवाई करने से इंकार कर दिया। कहा कि अर्जी लिस्टिंग होने के बाद सुनवाई पर विचार किया जाएगा। इसके अलावा भी उद्धव गुट की मुश्किलें कम होने के बजाय बढ़ती जा रही हैं। ऐसे में आज हम यह जानने की कोशिश करेंगे की ऐसी कोई घटना पहले हुई है या पहली बार है।

78 पन्नों के निर्णय: गौरतलब है कि शुक्रवार को 78 पन्नों के निर्णय में चुनाव आयोग ने शिवसेना और पार्टी का सिंबल शिंदे गुट को दे दिया। इसके अलावा आयोग ने यह भी कहा कि विकल्प के तौर पर शिंदे गुट को दिया गया पार्टी नाम “बालासाहेबची शिवसेना” और ढाल तलवार को फ्रिज कर दिया। हालांकि उद्धव गुट ने आयोग के फैसले को लोकतंत्र की हत्या बताया है। जबकि शिंदे गुट ने इस फैसले को सच्चाई की जीत बताया।

शिवसेना पर 54 से ठाकरे परिवार का कंट्रोल: आयोग के फैसले से शिवसेना अब पूरी तरह से शिंदे की हो गई है। जबकि शिवसेना पर 54 से ठाकरे परिवार का कंट्रोल था। अब ठाकरे परिवार के हाथ से पार्टी निकल चुकी है। शिवसेना की स्थापना बाला साहेब ठाकरे ने 1966 में किया था। लेकिन अब यह शिवसेना जब दो गुटों में बंटने के साथ गैर ठाकरे परिवार के हाथ में पहुंच गई है। इसी के साथ उद्धव गुट के विधायकों हुए सांसदों पर अब अयोग्यता का खतरा मंडराने लगा है। बहरहाल यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है।

चिराग पासवान-पशुपति कुमार पासवान: हालांकि भारत की राजनीति में यह पहली घटना नहीं है। बल्कि इससे पहले चिराग पासवान, शिवपाल यादव अनुप्रिया पटेल आदि के साथ भी ऐसी पार्टी छीना या बनाना शामिल रहा है। पिछले साल चिराग पासवान और उनके चाचा पशुपति कुमार पासवान में लोक जनशक्ति पार्टी का बंटवारा हो गया था। दो साल पहले पशुपति कुमार पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी का अध्यक्ष घोषित कर दिया था। बाद में जब यह मामला लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के पास पहुंचा तो उन्होंने पशुपति कुमार पासवान को लोक जन शक्ति पार्टी के संसदीय दल का नेता चुना था।पार्टी के छह में से पांच सांसदों ने पशुपति कुमार पासवान के साथ चले गए थे। इसके बाद चिराग ने कोर्ट भी गए लेकिन मामला हाथ से निकल गया।

अनुप्रिया बनाम मां कृष्णा पटेल: इसी तरह, 2009 में जब सोनेलाल का निधन हो गया था तो अपना दल की कमान उनकी पत्नी कृष्णा पटेल के हाथ में आ गई थी। उसके बाद जब उनकी बड़ी बेटी अनुप्रिया पटेल ने 2014 में लोकसभा का चुनाव जीत गई तो उन्होंने बगावत कर दी थी। जिसके के बाद कृष्णा पटेल ने अनुप्रिया पटेल और उनके पति आशीष सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया। उसके बाद अनुप्रिया ने अपना दल (सोनेलाल) के नाम से पार्टी बनाई।

सपा में बाप-बेटा की लड़ाई चाचा तक आई: राजनीति में सत्ता का ही संघर्ष होता है। यहां रिश्ता नाता सब सत्ता सुख होता है।  जिसका सबसे उदाहरण समाजवादी पार्टी है। समाजवादी पार्टी में भी अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम सिंह को पार्टी के अध्यक्ष पद हटाकर खुद यह कमान संभाल ली थी। बाद इस संघर्ष में शिवपाल यादव भी कूद पड़े थे।  जिसके बाद यह मामला कोर्ट पहुंचा था लेकिन ज्यादा तर विधायक अखिलेश यादव के साथ थे तो कोर्ट ने अखिलेश यादव को ही पार्टी की कमान सौंप दी। उसके बाद शिवपाल यादव ने अपनी नई पार्टी बना ली थी।

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