राजभर ने अपनी पार्टी के उम्मीदवारों की सूची जल्द जारी करने की घोषणा की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह ‘बगावत’ केवल बिहार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के अति पिछड़ा वोट बैंक पर भी असर डाल सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार भाजपा नेतृत्व ने केंद्रीय नेतृत्व को गुमराह किया है और उनकी पार्टी की उपेक्षा की गई है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में सुभासपा ने बहुजन समाज पार्टी और एआईएमआईएम के साथ मिलकर ‘ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेकुलर फ्रंट’ के तहत पाँच सीटों पर चुनाव लड़ा था। भले ही तब पार्टी को सीमित सफलता मिली हो, लेकिन सीमांचल और पूर्वी बिहार में उसने वोटों में सेंध लगाई थी। इस बार भी सुभासपा वही रणनीति अपनाने जा रही है, जहाँ अति पिछड़ा वर्ग निर्णायक भूमिका निभाता है।
बिहार में राजभर समुदाय की आबादी भले ही लगभग 0.17 प्रतिशत ही है, पर यह वोट बैंक बक्सर, सासाराम और पूर्वी चंपारण जैसे सीमावर्ती जिलों में प्रभावशाली है। यही वजह है कि सुभासपा का ‘वोट-कटवा’ प्रभाव कई सीटों पर एनडीए के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है।
राजभर का यह कदम भाजपा के लिए दोहरी चुनौती है—बिहार में एनडीए की जीत पर असर और उत्तर प्रदेश में अति पिछड़ा वोट बैंक में विश्वास की दरार। यदि यह मतभेद लंबे समय तक बना रहा, तो 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव तक भाजपा-सुभासपा गठबंधन के भविष्य पर सवाल उठना तय है।
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