बिहार में मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर सियासी घमासान तेज़ हो गया है। विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने शुक्रवार (2 अगस्त) को जारी हुई वोटर लिस्ट के पहले ड्राफ्ट पर गंभीर सवाल उठाते हुए दावा किया है कि खुद उनका नाम भी इस सूची में शामिल नहीं है। तेजस्वी यादव ने कहा, “जब मैंने वोटर लिस्ट में अपना नाम खोजने की कोशिश की, तो वहां ‘No Record Found’ का मैसेज आया। अब जब मेरा नाम ही लिस्ट में नहीं है, तो मैं चुनाव कैसे लड़ूंगा?” उन्होंने इसे चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर सीधा सवाल बताते हुए कहा कि यह प्रक्रिया आम मतदाताओं के अधिकारों का खुला उल्लंघन है।
तेजस्वी ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने 65 लाख लोगों के नाम वोटर लिस्ट से काट दिए हैं, बिना किसी नोटिस या पूर्व सूचना के। उन्होंने पूछा, “क्या आयोग ने इन 65 लाख लोगों को कोई नोटिस दिया? क्या उन्हें नाम हटाने से पहले अपनी बात कहने का अवसर दिया गया?”
नेता प्रतिपक्ष ने आरोप लगाया कि यह ड्राफ्ट देखने से लगता है कि चुनाव आयोग जानबूझकर टारगेटेड तरीके से कार्रवाई कर रहा है। उन्होंने कहा कि उनके साथ काम करने वाले कई स्टाफ का नाम भी लिस्ट में नहीं है, जो यह दर्शाता है कि मामला गंभीर है और इसमें सुनियोजित गड़बड़ी की आशंका है।
तेजस्वी यादव ने अपनी मांगों को विस्तार से रखते हुए कहा कि चुनाव आयोग को सबसे पहले बूथ-लेवल पर डेटा जारी करना चाहिए, न कि सिर्फ विधानसभा क्षेत्र के स्तर पर। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि किन-किन क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। उन्होंने यह भी मांग की कि 65 लाख हटाए गए नामों की पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए ताकि पारदर्शिता बनी रहे और जनता को अपने अधिकारों की जानकारी हो सके।
इसके साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि वह इस मामले में स्वत: संज्ञान ले और चुनाव आयोग से जवाबतलबी करे। तेजस्वी का कहना था कि आयोग को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि किन आधारों पर इन लाखों मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं, ताकि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो सके और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर उठ रहे संदेह दूर किए जा सकें।
तेजस्वी ने सवाल उठाया कि SIR की प्रक्रिया में पारदर्शिता का घोर अभाव है और यह साफ दर्शाता है कि चुनाव आयोग की नीयत पर अब सवाल खड़े हो रहे हैं। बता दें कि, SIR प्रक्रिया के तहत पहली ड्राफ्ट वोटर लिस्ट शुक्रवार को जारी की गई थी, और मतदाताओं को एक महीने का समय दिया गया है ताकि वे इसमें अपने नाम जुड़वाने, संशोधन या दावा-आपत्ति कर सकें। यह एक नियमित प्रक्रिया है लेकिन इस बार इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने को लेकर विवाद गहरा गया है।
अब देखने वाली बात होगी कि चुनाव आयोग इस मामले में क्या सफाई देता है और सुप्रीम कोर्ट यदि इस पर स्वत: संज्ञान लेता है या नहीं। फिलहाल, विपक्ष ने इसे एक संविधानिक संकट और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से छेड़छाड़ का मामला बताया है।
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