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न्यायिक अधिकारियों को कूच बिहार से टीएमसी नेता का धमकी भरा पत्र मामला

TMC नेता अभिजीत भौमिक ने मांगी माफी

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पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले में न्यायिक अधिकारियों को कथित तौर पर ‘धमकी भरे’ पत्र भेजने का मामला सामने आया है, जिससे राज्य में चुनावी माहौल के बीच विवाद गहरा गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के जिला अध्यक्ष अभिजीत डे भौमिक पर आरोप है कि उन्होंने अधीन-निर्णयन (एडजुडिकेशन) प्रक्रिया में लगे दो न्यायिक अधिकारियों को पत्र भेजे, जिनकी भाषा को अधिकारियों ने आपत्तिजनक और दबाव बनाने वाली बताया।

चौंकाने वाली बात यह रही की टीएमसी नेता भौमिक ने ये पत्र पार्टी के लेटरहेड पर लिखे थे, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि संबंधित अधिकारी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटा रहे हैं। इन पत्रों की भाषा को न्यायिक अधिकारियों ने धमकीपूर्ण मानते हुए जिला न्यायाधीश को सौंप दिया और मामले की जांच की मांग की।

मामले को न्यायपालिका ने अभूतपूर्व बताया है। बताया जा रहा है कि यह मुद्दा शुक्रवार शाम कलकत्ता हाईकोर्ट में हुई एक बैठक में भी उठा, जिसमें वरिष्ठ सरकारी अधिकारी मौजूद थे। इसके बाद इन पत्रों को राज्य के पुलिस महानिदेशक सिद्ध नाथ गुप्ता को सौंपा गया और आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए। हालांकि, विवाद बढ़ने के बाद अभिजीत डे भौमिक ने अपनी सफाई में माफी मांग ली है। उन्होंने कहा, “मैं पत्र की भाषा में किसी भी तरह की गलती के लिए ईमानदारी से माफी मांगता हूं।”

बता दें की भौमिक कूचबिहार दक्षिण विधानसभा सीट से तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार भी हैं। इस घटनाक्रम ने राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चिंता बढ़ा दी है।

वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं कानून-व्यवस्था की स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं, खासकर ऐसे समय में जब राज्य में चुनावी माहौल पहले से ही तनावपूर्ण है। एक अधिकारी ने कहा कि यदि न्यायिक अधिकारियों पर इस प्रकार का दबाव बनाया गया, तो इससे मतदाता सूची से जुड़े मामलों के निपटारे की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

सूत्रों के अनुसार, राज्य में करीब 60.06 लाख मतदाताओं के मामलों का निपटारा किया जाना है, जिसमें रोजाना 1.5 लाख से अधिक मामलों का निस्तारण हो रहा है। ऐसे में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप या दबाव इस प्रक्रिया की गति को धीमा कर सकता है। अधिकारियों ने यह भी आशंका जताई है कि इस तरह के घटनाक्रम से मतदाताओं में असंतोष बढ़ सकता है, खासकर उन लोगों में जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं।

 

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