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घोर अपराधियों के लिए कम्युनिस्टो का उमड़ा प्यार, जेल ले जाने से पहले दिया लाल सलाम!

हिंसक माओवाद और मार्क्सवाद में कोई अंतर नहीं।

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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPI(M) एक बार फिर राजनीतिक हिंसा को महिमामंडित करते दिखी है। यह एक और मौका है जब मार्क्सवादी कम्युनिस्टों और माओवादियों के रक्तरंजित क्रांति में कोई खास अंतर न होने का सबूत देता है। मामला पार्टी के घोर अपराधी कार्यकर्ताओं के विदाई समारोह का है, जो 1994 में हुए एक बर्बर हमले में दोषी ठहराए जा चुके हैं। उन्होंने भाजपा के राज्य उपाध्यक्ष और वर्तमान राज्यसभा सांसद सदनंदन मास्टर पर जानलेवा हमला करते हुए उन्हें जीवनभर के लिए व्हीलचेयर पर बैठा दिया।

अब, सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतिम अपील खारिज होने के बाद जब इन दोषियों को आत्मसमर्पण करना था, CPI(M) ने कोर्ट परिसर के बाहर और कन्नूर के मट्टनूर इलाके में जुलूस, नारेबाज़ी और माला पहनाकर उनका विजयी सम्मान किया। इसमें CPI(M) की वरिष्ठ नेत्री और विधायक केके शैलजा भी शामिल थी जिसने विरोध की आग में घी डालने का काम किया। कम्युनिस्ट विचारधारा की राजनीति से अपराधियों का संरक्षण कोई पुराना समीकरण नहीं है।

हमले के पीड़ित सदनंदन मास्टर ने कहा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण और समाज के लिए खतरनाक संदेश है। इन लोगों को हर अदालत ने दोषी माना, फिर भी CPI(M) ने उन्हें नायक की तरह पेश किया। और उससे भी अधिक शर्मनाक है, एक निर्वाचित MLA का इसमें भाग लेना।”

उनके मुताबिक, यह सिर्फ न्याय की अवहेलना नहीं, बल्कि युवाओं को राजनीतिक हिंसा को सही ठहराने का सार्वजनिक संदेश है।

25 जनवरी, 1994 की रात 30 वर्षीय शिक्षक सदनंदन मास्टर उस समय आरएसएस के ‘सह कार्यवाह’ भी थे। अपने गांव पेरिंचेरी लौट रहे थे। तभी CPI(M) के गुंडों ने उन्हें घेरकर लाठियों और धारदार हथियारों से उन पर हमला किया और दोनों पैर काट दिए। आसपास के लोग डर के मारे उनकी मदद भी नहीं कर सके। जब तक पुलिस पहुँची, वह अचेत हो चुके थे।

हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी। 1999 में फिर से पढ़ाना शुरू किया और वर्तमान में वह पेरमंगलम के श्री दुर्गा विलासम हायर सेकेंडरी स्कूल में सामाजिक विज्ञान के शिक्षक हैं।

इस मामले में 12 लोगों पर आरोप लगे थे, जिनमें से 8 को 1997 में दोषी ठहराया गया। इनपर TADA जैसे कड़े कानून भी लगे थे, जो बाद में राजनीतिक संरक्षण के चलते हटा दिए गए। दोषियों को 7 साल की सज़ा हुई, लेकिन ज़्यादातर समय वे राजनेताओं के आश्रय से जमानत पर बाहर रहे।

जनवरी 2025 में केरल हाईकोर्ट ने सज़ा बरकरार रखते हुए साफ कहा,“यह हमला न अचानक हुआ था, न आवेश में। यह पूर्वनियोजित था। दोषियों को कोई रियायत नहीं मिलनी चाहिए।” साथ ही कोर्ट ने हर दोषी को ₹50,000 का मुआवज़ा देने का आदेश भी दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने जब अपील खारिज कर दी, तो हाईकोर्ट ने इनकी बेल रद्द करते हुए 4 अगस्त तक आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया। लेकिन CPI(M) ने इसे कानूनी प्रक्रिया नहीं, राजनीतिक तमाशा बना डाला।

CPI(M) नेताओं का तर्क है कि यह पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रति संवेदनात्मक समर्थन था, लेकिन विडियो फुटेज, नारे, और उत्सव जैसा माहौल कुछ और ही बताना चाहता है। मानों एक विदेशी सड़ चुकी देशविरोधी कम्युनिस्ट विचारधारा के बचाव के लिए किसी अन्य विचारधारा के कार्यकर्ताओं या सामान्य शिक्षक को भी निशाना बनाना समर्थनीय है ऐसा कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का उत्सव कह रहा है।

सदनंदन मास्टर ने कहा, “जब एक निर्वाचित MLA दोषियों को नायक की तरह सम्मान देती हैं, तो वह युवाओं को संदेश देती हैं कि विचारधारा के नाम पर हिंसा भी वैध है।”

अब जबकि दोषी कन्नूर सेंट्रल जेल में बंद हैं, यह सवाल पूरे केरल में गूंज रहा है क्या राजनीतिक निष्ठा अब अपराध के दाग को धो सकती है? इस मुद्दे पर कांग्रेस, बीजेपी और सामाजिक संगठनों ने तीखी आलोचना की है, पर CPI(M) नेतृत्व चुप्पी साधे हुए है।

राजनीतिक हिंसा को पार्टी पहचान बना लेना न केवल लोकतंत्र का अपमान है, बल्की कम्युनिस्ट विचारधारा की सच्चाई का एक कोना है जिनमें सत्ता हथियाते ही सामान्य नागरिकों का जीवन भय और हिंसा से भरे अंधेरे कमरे में कैद जाता है।

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