बंगाल में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन–SIR) प्रक्रिया से जुड़े मामले की आज सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होनी है। इस मामले में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के स्वयं अदालत में उपस्थित रहने और व्यक्तिगत रूप से दलीलें रखने की संभावना है। सूत्रों के मुताबिक, ममता बनर्जी ने मुख्य न्यायाधीश से अनुमति मांगने का फैसला किया है ताकि वह SIR मामले में खुद अपनी बात रख सकें।
ममता बनर्जी के पास एलएलबी की डिग्री है। उन्होंने अपनी कानूनी टीम के माध्यम से एक अंतरिम आवेदन दाखिल किया है। इस आवेदन में सुप्रीम कोर्ट से यह अनुरोध किया गया है कि उन्हें सीधे तौर पर दलीलें पेश करने की अनुमति दी जाए। आवेदन में कहा गया है कि वह इस मामले में स्वयं याचिकाकर्ता हैं और केस से जुड़े तथ्यों से भली-भांति परिचित हैं।
बुधवार (4 फरवरी) को दिन में बाद में, मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ इस मामले से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। इन याचिकाओं में ममता बनर्जी के अलावा तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन, डोला सेन और याचिकाकर्ता मोस्तारी बानो की अर्जियां भी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट परिसर में प्रवेश के लिए ममता बनर्जी के नाम पर पास जारी किया जाना भी उनकी उपस्थिति के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
अपनी अंतरिम अर्जी में ममता बनर्जी ने यह भी कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट की गरिमा, कार्यप्रणाली और स्थापित प्रक्रियाओं से पूरी तरह अवगत हैं और न्यायालय के सभी नियमों का पालन करेंगी। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि SIR प्रक्रिया के कारण राज्य के निवासियों को जिन जमीनी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, उन्हें वह प्रत्यक्ष रूप से समझती हैं।
19 जनवरी की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया को लेकर कई निर्देश जारी किए थे। अदालत ने जोर दिया था कि यह प्रक्रिया पारदर्शी हो और मतदाताओं को किसी भी तरह की असुविधा न हो। कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि “तार्किक विसंगतियों” की श्रेणी में चिह्नित मतदाताओं के नाम ग्राम पंचायत भवनों और प्रखंड कार्यालयों में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किए जाएं।
साथ ही, इन्हीं केंद्रों को वह स्थान तय किया गया था जहां मतदाता अपने दस्तावेज जमा कर सकते हैं और आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं। चुनाव आयोग के अनुसार, तार्किक विसंगतियां उन मामलों को कहा गया है जिनमें 2002 की मतदाता सूची से जोड़ने में असंगतियां पाई गई हैं, जैसे माता-पिता के नाम में अंतर या मतदाता और उसके अभिभावक की उम्र में 15 साल से कम या 50 साल से अधिक का अंतर। कुछ पिता के २५० बच्चे, कुछ पिता के १०० बच्चे तो कुछ पिता के ५० बच्चे दिखाए गए है।
मामले की व्यापकता को देखते हुए, मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने यह भी नोट किया था कि राज्य में करीब 1.25 करोड़ मतदाताओं को “तार्किक विसंगतियों” की सूची में डाला गया है। इसके बाद 28 जनवरी को ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और अपनी याचिका में चुनाव आयोग तथा पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पक्षकार बनाया। इससे पहले उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर SIR प्रक्रिया को मनमाना और खामियों से भरा बताते हुए इसे रोकने की मांग की थी।
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