संयुक्त राष्ट्र महासभा में शुक्रवार (12 सितंबर) को हुए मतदान में भारत ने फिलिस्तीन की राज्य की मान्यता और दो-राष्ट्र समाधान के पक्ष में वोट देकर बड़ा रुख दिखाया है। यह कदम भारत की हालिया नीति से अलग माना जा रहा है, क्योंकि पिछले तीन वर्षों में नई दिल्ली ने चार बार ऐसे प्रस्तावों पर मतदान से परहेज़ किया था, जिनमें गाज़ा में युद्धविराम की मांग की गई थी।
भारी बहुमत से पारित प्रस्ताव
फ्रांस द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव ‘फिलिस्तीन के प्रश्न के शांतिपूर्ण समाधान और द्वि-राज्य समाधान के कार्यान्वयन पर न्यूयॉर्क घोषणा के समर्थन’ में 142 देशों ने पक्ष में मतदान किया, जबकि 10 देशों ने विरोध किया और 12 ने मतदान से परहेज़ किया। भारत भी उन 142 देशों में शामिल रहा, जिन्होंने प्रस्ताव का समर्थन किया। गल्फ अरब देशों ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि अमेरिका, इज़रायल, अर्जेंटीना, हंगरी, माइक्रोनेशिया, नाउरू, पलाउ, पापुआ न्यू गिनी, पैराग्वे और टोंगा ने इसका विरोध किया।

‘न्यूयॉर्क डिक्लेरेशन’ की मुख्य बातें
यह घोषणा जुलाई में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पर फ्रांस और सऊदी अरब की सह-अध्यक्षता में हुए उच्चस्तरीय सम्मेलन में तैयार की गई थी। इसमें कहा गया है कि, “गाज़ा में युद्ध को खत्म करने और इस्राइल-फिलिस्तीन संघर्ष का न्यायपूर्ण, शांतिपूर्ण और स्थायी समाधान निकालने के लिए सामूहिक कार्रवाई करनी होगी।”
घोषणा पत्र में 7 अक्टूबर को हमास के हमले की निंदा की गई, जिसमें 1,200 लोगों की मौत हुई और 250 से अधिक को बंधक बना लिया गया। साथ ही इज़रायल के जवाबी अभियान की आलोचना की गई, जिसमें हजारों नागरिकों की मौत, बुनियादी ढांचे का विनाश और नाकेबंदी व भूखमरी जैसी मानवीय तबाही सामने आई। घोषणा ने इज़रायल से दो-राष्ट्र समाधान पर सार्वजनिक प्रतिबद्धता जताने, बस्तियों के विस्तार और भूमि कब्जे को तुरंत रोकने तथा पूर्वी येरुशलम सहित कब्ज़े वाले इलाकों में हिंसा व उकसावे की कार्रवाई बंद करने की अपील की।
अमेरिका और इज़रायल का विरोध
इज़रायल ने इस कदम को खारिज करते हुए कहा कि महासभा हकीकत से कटी हुई राजनीतिक सर्कस बन चुकी है। इज़रायली विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ओरेन मर्मोरस्टीन ने कहा, “इस घोषणा में हमास को एक भी बार आतंकवादी संगठन नहीं कहा गया है।” अमेरिका ने भी इसका कड़ा विरोध किया। अमेरिकी राजनयिक मॉर्गन ऑर्टागस ने कहा, “यह प्रस्ताव हमास के लिए तोहफ़ा है। यह महज़ राजनीतिक दिखावा है।” अमेरिका ने जुलाई सम्मेलन और उसके बाद आए इस प्रस्ताव दोनों का विरोध किया।
ज्ञात हो की, 7 अक्टूबर के हमले में 1,200 लोगों की जान गई और 251 लोग बंधक बनाए गए। इसके बाद गाज़ा में स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों के मुताबिक अब तक 64,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें ज्यादातर नागरिक हैं। इजरायल और हमास के बीच युद्ध से लाखों फिलिस्तीनियों पर संकटों का पहाड़ टूट पड़ा है।
भारत का यह वोट फिलिस्तीन-इज़रायल मुद्दे पर उसकी पारंपरिक संतुलनकारी कूटनीति में बदलाव का संकेत देता है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह रुख अरब देशों के साथ भारत के रिश्तों और वैश्विक मंच पर उसकी छवि को मजबूत कर सकता है।
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