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ईरान-इजरायल और अमेरिका युद्ध बन सकता है बड़ी मानवीय तबाही : रवीना शमदासानी!

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यह संघर्ष सिर्फ सैन्य या राजनीतिक संकट नहीं है बल्कि इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और आम लोगों के जीवन पर भी पड़ रहा है।

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ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते संघर्ष को लेकर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने गंभीर चिंता जताई। आईएएनएस से खास बातचीत में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की प्रवक्ता रवीना शमदासानी ने कहा कि यह संघर्ष तेजी से एक बड़े क्षेत्रीय संकट का रूप ले सकता है और इसके प्रभाव सिर्फ मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेंगे बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ सकते हैं।

उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र कई महीनों से इस स्थिति पर नजर रखे हुए था और युद्ध शुरू होने से ठीक पहले भी संघर्ष के बढ़ने की आशंका जताई गई थी। रवीना शमदासानी ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने कई महीने पहले ही चेतावनी दी थी कि क्षेत्र में तनाव तेजी से बढ़ रहा है और किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई का असर पूरे क्षेत्र और दुनिया पर पड़ेगा।

उन्होंने कहा, “युद्ध शुरू होने से एक हफ्ते पहले ही हमारी निगरानी से यह संकेत मिल रहे थे कि संघर्ष का खतरा बहुत बढ़ गया है। हमने चेतावनी दी थी कि अगर युद्ध शुरू हुआ तो उसका असर पूरे क्षेत्र और उससे बाहर तक पड़ेगा। दुर्भाग्य से अब वही हो रहा है।” उनके मुताबिक, अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हमलों के बाद स्थिति और बिगड़ गई।

इसके बाद ईरान की ओर से मुख्य रूप से खाड़ी देशों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई हुई। फिर हिज्बुल्लाह ने इजरायल पर हमले किए और इसके जवाब में इजरायल ने लेबनान में बड़े हमले किए। उन्होंने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम के आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभाव भी गंभीर हो सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यह संघर्ष सिर्फ सैन्य या राजनीतिक संकट नहीं है बल्कि इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और आम लोगों के जीवन पर भी पड़ रहा है।

रवीना शमदासानी ने कहा कि खाड़ी देशों में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों के लिए हालात कठिन हो सकते हैं क्योंकि संघर्ष के कारण वे अपने देशों में पैसे भेजने में दिक्कत का सामना कर सकते हैं। इसके अलावा ईंधन की वैश्विक कीमतें बढ़ने से मानवीय सहायता और खाद्य सहायता कार्यक्रम भी प्रभावित हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र इस युद्ध के तत्काल प्रभावों के साथ-साथ इसके दीर्घकालिक परिणामों पर भी नजर रख रहा है। संघर्ष के दौरान नागरिकों और बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को लेकर पूछे गए सवाल पर शमदसानी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून बहुत स्पष्ट है।

उन्होंने कहा, “कुछ लोग सोचते हैं कि यह केवल आदर्शवादी सिद्धांत हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। यह वास्तव में युद्ध के कानून हैं। युद्ध के भी नियम होते हैं और संघर्ष में शामिल सभी पक्षों को उनका पालन करना जरूरी होता है।” इन कानूनों के अनुसार सभी पक्षों को हर संभव प्रयास करना चाहिए कि नागरिकों और नागरिक ढांचे की सुरक्षा सुनिश्चित हो।

हालांकि रवीना शमदासानी ने कहा कि इस युद्ध में पहले ही कई अहम नागरिक ढांचों पर हमले देखे जा चुके हैं, जिनमें डिसेलिनेशन प्लांट (समुद्री पानी को पीने योग्य बनाने वाले संयंत्र), स्कूल और मेडिकल सुविधाएं शामिल हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि नागरिक ढांचों पर जानबूझकर हमला करना युद्ध अपराध माना जा सकता है।

ईरान के मिनाब शहर में एक गर्ल्स स्कूल पर हुए हमले के बारे में पूछे जाने पर शमदसानी ने इसे बेहद भयावह घटना बताया। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की ईरान में प्रत्यक्ष मौजूदगी नहीं है, लेकिन विश्वसनीय स्रोतों के जरिए इस घटना की जानकारी जुटाई जा रही है।

उनके अनुसार इस हमले में करीब 160 से ज्यादा छात्राओं की मौत हुई, जब वे अपने स्कूल में पढ़ाई कर रही थीं।

उन्होंने कहा, “यह अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन हो सकता है। हम इस घटना की तुरंत और निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।” रवीना शमदासानी ने यह भी कहा कि जांच के नतीजे सार्वजनिक किए जाने चाहिए और दोषियों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, युद्ध के दौरान स्कूल, अस्पताल और अन्य जरूरी नागरिक ढांचे संरक्षित स्थान माने जाते हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसे स्थानों पर जानबूझकर हमला करना अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है। उन्होंने बताया कि आम तौर पर संघर्ष में शामिल पक्षों के पास इन स्थानों के सटीक लोकेशन और निर्देशांक होते हैं ताकि उन्हें निशाना न बनाया जाए।

उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में कई संघर्षों में स्कूलों और अस्पतालों पर हमले हुए हैं, लेकिन अक्सर दोषियों को सजा नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि गाजा और यूक्रेन जैसे संघर्षों में भी ऐसी घटनाएं हुई हैं और कई मामलों में जिम्मेदार लोगों को सजा नहीं मिली।

उनके अनुसार मिनाब स्कूल हमले के मामले में भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय, पत्रकारों, संयुक्त राष्ट्र और सदस्य देशों को मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दोषियों को सजा मिले। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने इस संघर्ष को खत्म करने के लिए तुरंत युद्धविराम (सीजफायर) की अपील की है।

रवीना शमदासानी ने कहा कि अभी स्थिति ‘जवाबी हमलों’ के खतरनाक चक्र में फंस गई है और लगातार युद्ध भड़काने वाली बयानबाजी हो रही है। जब उनसे पूछा गया कि क्या यह संघर्ष एक बड़े खाड़ी युद्ध का रूप ले सकता है, तो उन्होंने कहा कि स्थिति बेहद चिंताजनक है।

उन्होंने चेतावनी दी कि यह संघर्ष पूरे मध्य-पूर्व और उससे बाहर तक फैल सकता है।

उन्होंने कहा, “यह ऐसा है जैसे बारूद का ढेर पड़ा हो और उसके आसपास आग फैल रही हो। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि यह बारूद का ढेर फटे नहीं।” अगर ईरान खाड़ी देशों में तेल डिपो या डिसेलिनेशन प्लांट को निशाना बनाता है तो क्या यह जायज होगा? इस सवाल पर उन्होंने साफ कहा कि ऐसा करना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होगा।

उनके अनुसार डिसेलिनेशन प्लांट जैसे ढांचे आम नागरिकों के जीवन के लिए जरूरी होते हैं, इसलिए उन्हें निशाना बनाना स्वीकार्य नहीं है। संघर्ष को खत्म करने में भारत की संभावित भूमिका पर उन्होंने कहा कि भारत जैसे बड़े और प्रभावशाली देश संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान के लिए आवाज उठा सकते हैं।

उन्होंने कहा कि इस युद्ध का असर भारत तक भी पहुंच रहा है, इसलिए भारत सहित दुनिया के सभी देशों को मिलकर इसे खत्म करने के प्रयास करने चाहिए। हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री और ईरान के राष्ट्रपति के बीच फोन पर हुई बातचीत के बारे में उन्होंने कहा कि वह द्विपक्षीय बातचीत पर टिप्पणी नहीं कर सकतीं।

हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि दुनिया के सभी नेताओं को अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए युद्ध को खत्म करने की दिशा में काम करना चाहिए।

 
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