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“वे मुफ्त की सलाह देते हैं”: ऑपरेशन सिंदूर पर पश्चिमी ‘पाखंड’ को लेकर एस जयशंकर का तंज

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विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान में पश्चिमी देशों के रुख पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि कई दूर बैठे देश दूसरों के क्षेत्रों में तनाव को लेकर चिंता जताते हैं, लेकिन अपने ही इलाकों में मौजूद जोखिमों और हिंसा पर नजर डालने से कतराते हैं। जयशंकर ने यह टिप्पणी बुधवार (7 जनवरी) को लक्ज़मबर्ग में भारतीय समुदाय के सदस्यों के साथ बातचीत के दौरान की।

जयशंकर ने कहा कि जो देश भारत के साथ सकारात्मक और सहयोगी तरीके से काम करने को तैयार हैं, उनसे उसी भावना के साथ निपटा जाना चाहिए, जबकि जो देश पाकिस्तान जैसी नीतियों और गतिविधियों में लिप्त हैं, उनके साथ अलग तरीके से व्यवहार करना पड़ता है। उन्होंने कहा, “तो जो हमारे साथ काम करने को तैयार हैं, मददगार और सकारात्मक हैं, उनसे हमें उसी तरह से निपटना चाहिए। और जो पाकिस्तान जैसे काम करते हैं, उनसे हमें अलग तरीके से निपटना होगा।”

विदेश मंत्री ने पश्चिमी देशों की उस प्रवृत्ति पर भी व्यंग्य किया, जिसमें वे स्थानीय या क्षेत्रीय संघर्षों पर दूसरों को सलाह देते हैं, लेकिन अक्सर बिना आत्ममंथन के। उन्होंने कहा, “अब, दुनिया के बाकी हिस्सों में जो हो रहा है, वह किस हद तक उन्हें प्रभावित करता है, यह कहना मुश्किल है। दूर बैठकर लोग बातें करते हैं, कभी सोच-समझकर, कभी बिना सोचे, कभी अपने स्वार्थ में, तो कभी लापरवाही से। यह चलता रहेगा।”

जयशंकर ने कहा कि आज के दौर में देश आदर्शवाद से ज्यादा अपने प्रत्यक्ष हितों के आधार पर फैसले लेते हैं। उन्होंने टिप्पणी की, “लेकिन अंत में मैं आपको बता सकता हूं कि आज के समय में देश ज्यादा- मैं यह नहीं कहूंगा कि वे ज्यादा स्वार्थी हो गए हैं- लेकिन वे वही करेंगे जिससे उन्हें सीधा फायदा हो। वे आपको मुफ्त की सलाह देंगे। अगर कुछ होता है तो कहेंगे, नहीं, कृपया ऐसा मत कीजिए। हमें चिंता होती है अगर तनाव बढ़ता है।”

उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मिले अंतरराष्ट्रीय परामर्शों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत ने इसे वैश्विक राजनीति की वास्तविकता के तौर पर स्वीकार किया। जयशंकर ने कहा, “कभी-कभी आप लोगों को यह कहते सुनते हैं, जैसे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हुआ। अगर आप उनसे पूछें कि आपको सच में चिंता है, तो क्यों न आप अपने क्षेत्र को देखें? वहां हिंसा के स्तर क्या हैं, कितने जोखिम उठाए गए हैं, और हम में से बाकी लोग इस बात को लेकर कितने चिंतित हैं कि आप क्या कर रहे हैं। लेकिन यही दुनिया का स्वभाव है। लोग जो कहते हैं, वही करते नहीं हैं। और हमें इसे भी उसी भावना में स्वीकार करना होता है।”

अपने संबोधन के दौरान जयशंकर ने भारत-लक्ज़मबर्ग संबंधों के व्यापक संदर्भ पर भी बात की। उन्होंने राजनीति, व्यापार और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच बढ़ती साझेदारी का उल्लेख किया। बाद में सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में उन्होंने लिखा, “आज लक्ज़मबर्ग में भारतीय समुदाय के सदस्यों से बातचीत कर खुशी हुई। राजनीतिक, व्यापार और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में भारत-लक्ज़मबर्ग साझेदारी के गहराते स्वरूप को रेखांकित किया। भारत-लक्ज़मबर्ग संबंधों को मजबूत करने में हमारे प्रवासी समुदाय के योगदान की सराहना करता हूं।”

जयशंकर की ये टिप्पणियां ऐसे समय आई हैं जब भारत अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता और यथार्थवादी दृष्टिकोण पर जोर दे रहा है, खासकर क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मुद्दों पर।

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