दिल्ली हाईकोर्ट में जज रहते ‘कैश कांड’ से सुर्खियों में आए और वर्तमान में इलाहाबाद हाईकोर्ट में पदस्थ न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो गई है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने मंगलवार को 146 सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। स्पीकर ने बताया कि न्यायाधीश जांच अधिनियम 1968 की धारा 3(2) के तहत आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया है। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनिंदर मोहन श्रीवास्तव और कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य शामिल हैं। समिति जल्द से जल्द अपनी रिपोर्ट पेश करेगी, तब तक प्रस्ताव लंबित रहेगा।
मामला मार्च 2025 का है, जब जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लगने के बाद कथित रूप से बड़ी मात्रा में जले हुए नोट बरामद हुए थे। सुप्रीम कोर्ट की एक आंतरिक समिति ने जांच में इसे “गंभीर कदाचार” मानते हुए उनकी भूमिका पर सवाल उठाए थे। जस्टिस वर्मा लगातार आरोपों से इनकार करते रहे हैं, लेकिन विवादों के बीच उनका तबादला वापस इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया था।
संविधान के अनुसार, किसी जज को महाभियोग के जरिए हटाने की प्रक्रिया कई चरणों में होती है, आरोपों पर प्रारंभिक जांच, तीन सदस्यीय समिति द्वारा सुनवाई, संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित होना, और अंत में राष्ट्रपति द्वारा हटाने का आदेश जारी करना। भारत के इतिहास में अब तक किसी जज को इस प्रक्रिया के माध्यम से पद से नहीं हटाया गया है, हालांकि कई बार प्रयास हुए हैं।
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