मुंबई में इस साल के अंत में होने वाले महानगरपालिका चुनावों से पहले महाराष्ट्र की राजनीति गरमा गई है। राज्य की सत्ता पर काबिज भाजपा और उसके सहयोगी दल जहां अपने अभियान को अंतिम रूप दे रहे हैं, वहीं विपक्षी खेमे से कांग्रेस, शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना अब भी अपने खोए हुए जनाधार को वापस पाने की कोशिश में लगे हैं।
2024 के विधानसभा चुनावों में 132 सीटें जीतकर बीजेपी ने एक बार फिर अपनी ताकत दिखाई। लोकसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन (सिर्फ 9 सीटें) के महज छह महीने बाद यह जीत बीजेपी के लिए बड़ी राहत बनी। अब पार्टी की नजर है 2029 के विधानसभा चुनाव पर — लेकिन इस बार वो अपने बलबूते सरकार बनाने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही है।
इसके लिए पार्टी संगठन निर्माण, हिंदुत्व आधारित कठोर एजेंडा, दूसरे दलों से नेताओं को तोड़कर अपने खेमे में शामिल करने पर है। बीते मंगलवार, भाजपा ने वसई, अमरावती, रायगढ़ और धाराशिव जैसे इलाकों से 50 से अधिक नेताओं को पार्टी में शामिल कराया, जिनमें अधिकतर कांग्रेस या उद्धव ठाकरे की शिवसेना से आए थे।
राज्य बीजेपी अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने इस मौके पर कहा, “राज्य और केंद्र में हमारी सरकार है, लेकिन जब तक स्थानीय निकायें उसी विचारधारा से नहीं चलेंगी, तब तक नीतियों का सही क्रियान्वयन नहीं होगा। इसलिए हमारा अगला फोकस BMC चुनाव है।”
दौरान उद्धव ठाकरे की शिवसेना एक कठिन दौर से गुजर रही है। 2019 में 56 सीटों पर जीत के बाद पार्टी 2024 में सिर्फ 20 सीटों तक सिमट गई। ऊपर से बड़े नेताओं का लगातार पार्टी छोड़ना और शिंदे खेमे में शामिल होना, संगठन के लिए गंभीर झटका बना हुआ है।
पार्टी के भीतर भी अब ‘ऑपरेशन टाइगर’ यानी ठाकरे गुट को जड़ से उखाड़ने की शासकीय योजना को लेकर चिंता है। हालांकि सार्वजनिक रूप से ठाकरे गुट ने इस पर ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन नेता भास्कर जाधव का भावुक पत्र इसका संकेत है।
अब ठाकरे खेमे में रणनीतिक बदलाव की बात हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार, उद्धव ठाकरे राज ठाकरे की एमएनएस के साथ गठबंधन को लेकर भी खुले नजर आ रहे हैं भले ही अभी घोषणा न की हो। “एमएनएस से गठबंधन होगा या नहीं, वह तय होगा। लेकिन आप सभी सीटों पर चुनाव की तैयारी शुरू करें,” ठाकरे ने कार्यकर्ताओं से कहा।
महाविकास अघाड़ी (MVA) की प्रमुख पार्टी कांग्रेस भी आंतरिक उथल-पुथल में है। लोकसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद, विधानसभा में खराब नतीजों और अशोक चव्हाण जैसे नेताओं के पार्टी छोड़ने से कांग्रेस को गहरी चोट पहुंची।
अब पार्टी कोशिश कर रही है पुराने चेहरों को दोबारा जोड़ने की जैसे कि शरद पवार की एनसीपी से पूर्व विधायक बाबाजानी दुराबनी की कांग्रेस में वापसी। भले ही इससे तात्कालिक वोट न जुड़ें, लेकिन कांग्रेस को उम्मीद है कि इससे MVA में उसकी वरिष्ठ साझेदार की छवि फिर से स्थापित हो सकेगी।
बीजेपी जहां मजबूत संगठन और एकल नेतृत्व की नीति के साथ तेजी से आगे बढ़ रही है, वहीं विपक्षी खेमा अब भी संतुलन बनाने, भीतर की दरारें भरने और जनविश्वास वापस पाने के लिए तरह तरह की तरकीबें अपना रहा है। मुंबई नगर निगम चुनाव सिर्फ एक स्थानीय लड़ाई नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि महाराष्ट्र की राजनीति में 2029 तक किसका प्रभाव बढ़ेगा और कौन हाशिये पर जाएगा।
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