महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में शहरी क्षेत्रों में शहरी नक्सलवाद (Urban Naxalism) से निपटने के लिए एक सख्त कानून को मंजूरी दी है। गुरुवार (10 जुलाई) को विधानसभा में और शुक्रवार (11 जुलाई) को विधानपरिषद में ध्वनि मत से पारित किए गए इस महाराष्ट्र विशेष सार्वजनिक सुरक्षा (MSPS) विधेयक का उद्देश्य वामपंथी उग्रवादी संगठनों की ‘अवैध गतिविधियों’ को रोकना और नियंत्रण में लाना है। यह विधेयक पिछले वर्ष मानसून सत्र में पहली बार पेश किया गया था और इसमें अब तक तीन संशोधन किए जा चुके हैं। विधेयक को अब विधान परिषद में पेश किया जाएगा, और वहां से पारित होने के बाद राज्यपाल की मंजूरी से यह विधेयक कानून का रूप ले लेगा।
विधेयक के उद्देश्यों और कारणों के वक्तव्य में कहा गया है कि, “नक्सलवाद अब केवल दूरदराज के क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके फ्रंटल संगठनों के माध्यम से यह शहरी क्षेत्रों में भी तेजी से पैर पसार रहा है।” राज्य सरकार के अनुसार, ये संगठन नक्सली कैडरों को लॉजिस्टिक समर्थन, वित्तीय सहायता, और सुरक्षित शरण प्रदान करते हैं, और मौजूदा कानून इस चुनौती से निपटने में पर्याप्त नहीं हैं।
ज्ञात हों की अन्य राज्यों — छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा — ने पहले ही अपने-अपने सार्वजनिक सुरक्षा कानून लागू करके 48 फ्रंटल नक्सल संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया है। इसी तर्ज पर महाराष्ट्र ने भी यह विधेयक लाकर एक कठोर कानूनी ढांचा तैयार किया है।
महाराष्ट्र विशेष सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक राज्य सरकार को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह किसी भी संगठन को “अवैध संगठन” घोषित कर सके। इस विधेयक के अंतर्गत चार प्रमुख प्रकार के अपराधों को परिभाषित किया गया है। पहला, किसी अवैध संगठन का सक्रिय सदस्य होना;
दूसरा, संगठन का सदस्य न होते हुए भी उसके लिए धन एकत्र करना;
तीसरा, संगठन का संचालन करना या उसके संचालन में किसी भी रूप में सहायता करना;
और चौथा, किसी भी प्रकार की “अवैध गतिविधि” में शामिल होना।
इन अपराधों के लिए कठोर दंड का प्रावधान है, जिसमें दो साल से लेकर सात साल तक की सजा और ₹2 लाख से ₹5 लाख तक का जुर्माना शामिल है। विशेष रूप से, “अवैध गतिविधि” से संबंधित अपराध पर सबसे कड़ा दंड निर्धारित किया गया है — सात साल का कारावास और ₹5 लाख का जुर्माना। इसके अतिरिक्त, इन सभी अपराधों को गंभीर (cognizable) तथा अजमानती (non-bailable) श्रेणी में रखा गया है, जिससे पुलिस को वारंट के बिना भी गिरफ्तारी का अधिकार प्राप्त होता है।
‘अवैध गतिविधि’ की परिभाषा:
महाराष्ट्र विशेष सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक में “अवैध गतिविधि” को एक विस्तृत और व्यापक परिभाषा दी गई है, जिसमें ऐसे किसी भी कार्य को शामिल किया गया है जो राज्य की सार्वजनिक शांति, कानून व्यवस्था या सरकारी संस्थाओं की कार्यप्रणाली के लिए खतरा उत्पन्न करता हो।
इसमें ऐसे कृत्य भी शामिल हैं जो किसी सार्वजनिक सेवक को डराने या दबाव में लाने के उद्देश्य से आपराधिक बल या उसकी धमकी का प्रयोग करते हैं। इसके अलावा, विधेयक में हिंसा, तोड़फोड़, भय फैलाने वाले प्रयासों, तथा ऐसी किसी भी कार्रवाई को ‘अवैध गतिविधि’ माना गया है जो जनता में दहशत फैलाने या संस्थाओं की वैधता को चुनौती देने के उद्देश्य से की जाती हो।
इस परिभाषा में उन कार्यों को भी शामिल किया गया है जिनका उद्देश्य इन अवैध गतिविधियों को अंजाम देने के लिए धन, सामग्री या संसाधनों का संग्रह करना हो। चूंकि यह परिभाषा अत्यंत व्यापक और व्याख्यायोग्य है, इसलिए कई नागरिक अधिकार संगठनों ने इसे मनमानी की आशंका के चलते विवादित बताया है और इसकी वैधानिक स्पष्टता पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं।
यह विधेयक पहली बार 2024 के मानसून सत्र के अंतिम दिनों में पेश किया गया था। परंतु विधानसभा स्थगित होने के कारण इसे पारित नहीं किया जा सका। इसके बाद दिसंबर में इसे फिर से पेश किया गया, जब देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बने। उस समय उन्होंने विपक्ष और नागरिक संगठनों की आपत्तियों को देखते हुए विधेयक को संयुक्त चयन समिति को भेजने की घोषणा की थी। इस 25 सदस्यों वाली संयुक्त चयन समिति का नेतृत्व राज्य के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुळे ने किया। समिति ने मार्च से जून के बीच पांच बैठकें आयोजित कीं और 1200 से अधिक सुझाव एवं आपत्तियाँ प्राप्त कीं।
तीन मुख्य संशोधन किए गए:
प्रींबल और शीर्षक में बदलाव:
पहले शीर्षक में लिखा था कि यह विधेयक “व्यक्तियों और संगठनों की अवैध गतिविधियों की रोकथाम” हेतु है। अब इसे “वामपंथी उग्रवादी संगठनों या इसी प्रकार के संगठनों की अवैध गतिविधियों” के लिए स्पष्ट किया गया है। यह बदलाव ‘अर्बन नक्सलिज्म’ को सीधे लक्षित करता है।
सलाहकार बोर्ड की रचना में बदलाव:
पहले प्रस्ताव था कि बोर्ड में तीन उच्च न्यायालय के न्यायाधीश या योग्य व्यक्ति होंगे। संशोधन के अनुसार, अब एक अध्यक्ष (पूर्व न्यायाधीश), एक सदस्य (सेवानिवृत्त न्यायाधीश) और एक सदस्य (सरकारी वकील) को शामिल किया जाएगा।
जांच अधिकारी के स्तर में बदलाव:
पहले उप निरीक्षक (Sub-Inspector) को जांच का अधिकार था। अब संशोधन के अनुसार, जांच उप पुलिस अधीक्षक (DySP) स्तर के अधिकारी द्वारा की जाएगी।
PUCL (People’s Union for Civil Liberties) जैसे संगठनों ने विधेयक को पूरी तरह वापस लेने की मांग की थी। उनका तर्क था कि “अवैध गतिविधि” जैसी परिभाषाएं अत्यधिक खुली हुई हैं और इन्हें सरकारी मनमानी के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। कई संगठनों ने डर जताया कि इससे बोलने की स्वतंत्रता और असहमति को दबाने का माध्यम बनाया जा सकता है।
महाराष्ट्र विशेष सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक को वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ एक निर्णायक कदम के रूप में देखा जा रहा है, खासकर शहरी क्षेत्रों में कथित रूप से सक्रिय “अर्बन नक्सल” नेटवर्क को लक्षित करने के लिए। आगामी दिनों में विधान परिषद और फिर राज्यपाल की मंजूरी के बाद यह कानून बन जाएगा। तब इसके क्रियान्वयन और असर पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा।
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