बिहार की राजनीति में एक और इतिहास रचते हुए जनता दल (यूनाइटेड) के प्रमुख नीतीश कुमार ने गुरुवार(20 नवंबर) को बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ 10वीं बार ग्रहण की। पटना के प्रतिष्ठित गांधी मैदान में आयोजित इस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद रहे। खास बात यह रही कि वर्ष 2020 में आयोजित शपथ ग्रहण में पीएम मोदी शामिल नहीं हुए थे, लेकिन इस बार उनकी उपस्थिति ने राजनीतिक रूप से कई संकेत छोड़े।
गांधी मैदान 2005, 2010 और 2015 में भी नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण का साक्षी रहा है, एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में दिखाई दिया। यह वही स्थान है जिसे जयप्रकाश नारायण की 1974 की ‘संपूर्ण क्रांति’ की पुकार के लिए जाना जाता है। ऐसे ऐतिहासिक स्थल पर सत्ता हस्तांतरण का मंच सजना अपने आप में राजनीतिक संदेश देता है।
समारोह में एनडीए के शीर्ष नेतृत्व की मजबूत एकजुटता भी दिखाई दी। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायबसिंह सैनी, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा, नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों की उपस्थिति ने गठबंधन के सामूहिक समर्थन का प्रदर्शन किया।
शपथ ग्रहण का संचालन बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने किया। इस अवसर पर एलजेपी (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान समेत कई अन्य वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी ने भी समारोह को राजनीतिक दृष्टि से और महत्वपूर्ण बना दिया। नेताओं के बीच बदलते समीकरणों और एनडीए की आगामी रणनीतियों के संदर्भ में यह कार्यक्रम कई मायनों में अहम माना जा रहा है।
नीतीश कुमार का 10वां शपथ ग्रहण न केवल उनकी लंबी रफ्तार वाली राजनीतिक यात्रा को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि बिहार की राजनीति में उनका प्रभाव अब भी मजबूत और निर्णायक है। शासन, प्रशासन और गठबंधन राजनीति इन तीनों क्षेत्रों में उनकी लगातार सक्रिय उपस्थिति उन्हें भारत के सबसे अनुभवी मुख्यमंत्रियों की श्रेणी में और ऊंचा स्थान दिलाती है। बिहार में सत्ता परिवर्तन के इस नए चरण के साथ, राज्य की राजनीतिक दिशा और भविष्य की नीतियों पर अब सभी की नज़रें टिकी हुई हैं।
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