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सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति को लेकर कोलिजियम में मतभेद, क्षेत्रीय संतुलन पर उठे सवाल!

इन नियुक्तियों से सुप्रीम कोर्ट की जजों की संख्या 32 से बढ़कर पूर्ण स्वीकृत क्षमता 34 हो जाएगी। सूत्रों के अनुसार,

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सुप्रीम कोर्ट कोलिजियम द्वारा पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश विपुल एम. पांचोली को शीर्ष अदालत में पदोन्नति के लिए भेजी गई सिफारिश पर एक सदस्य ने कड़ा असहमति पत्र दर्ज कराया है। इस आपत्ति का मुख्य आधार रहा क्षेत्रीय असंतुलन और न्यायिक नियुक्तियों पर इसके दीर्घकालिक प्रभाव है।

कोलिजियम की अध्यक्षता वर्तमान मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई कर रहे हैं, ने सोमवार (25 अगस्त)को केंद्र सरकार को दो नाम भेजे बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश आलोक अराधे और पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पांचोली। इन नियुक्तियों से सुप्रीम कोर्ट की जजों की संख्या 32 से बढ़कर पूर्ण स्वीकृत क्षमता 34 हो जाएगी। सूत्रों के अनुसार, कोलिजियम की पांच सदस्यीय टीम में से जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने लिखित रूप में पांचोली की नियुक्ति पर आपत्ति जताई।  उन्होंने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही गुजरात हाईकोर्ट से आने वाले दो न्यायाधीश जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस एन.वी. अंजरिया सेवा दे रहे हैं। ऐसे में तीसरे न्यायाधीश की नियुक्ति क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का संतुलन बिगाड़ सकती है।

नागरत्ना ने यह भी सवाल उठाया कि पांचोली को हाल ही में गुजरात से पटना स्थानांतरित किया गया था और अब उनकी तेजी से पदोन्नति पर विचार किया जा रहा है। उनके अनुसार, यह गलत मिसाल पेश करेगा और कोलिजियम की विश्वसनीयता पर संदेह खड़ा करेगा।

नागरत्ना के नोट में यह भी उल्लेख है कि यदि पांचोली की नियुक्ति होती है, तो वे अक्टूबर 2031 से लगभग दो साल तक भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बनने की पंक्ति में होंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि क्षेत्रीय पहलुओं को नजरअंदाज किया गया तो यह न्याय के प्रशासन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

वर्तमान कोलिजियम में मुख्य न्यायाधीश गवई के अलावा जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस बी.वी. नागरत्ना शामिल हैं। यदि दोनों नामों को केंद्र सरकार की मंज़ूरी मिल जाती है, तो अराधे और पांचोली शीर्ष अदालत में शामिल होंगे और महीनों बाद सुप्रीम कोर्ट फिर से अपनी पूर्ण क्षमता 34 जजों के साथ काम करेगा।

यह घटनाक्रम बताता है कि न्यायपालिका के भीतर भी क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और संस्थागत संतुलन को लेकर गहरी संवेदनशीलता बनी हुई है, और उच्चतम न्यायालय की नियुक्ति प्रक्रिया पर लगातार बहस जारी है।

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